न्याय
घायल हंस
पढ़ो कि सिद्धार्थ को एक घायल हंस कैसे मिला।
आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 9 'न्याय' नाटक के पहले दृश्य में, जब सिद्धार्थ और सखा राजहंसों को उड़ते देख रहे थे, अचानक कुछ हुआ। किसी ने तीर चलाया! एक हंस घायल होकर तेज़ी से धरती की ओर गिरने लगा। वह दर्द से चीख रहा था, और बाकी हंस डरकर जान बचाकर भाग गए।
घायल हंस सीधे सिद्धार्थ की गोद में आ गिरा। उसके शरीर में तीर लगा था और खून बह रहा था। सिद्धार्थ का मन करुणा (दया) से भर गया। उन्होंने हंस को सँभाला और बोले — किस निर्दयी ने इस भोले-भाले पक्षी को घायल किया? इसने किसी का क्या बिगाड़ा था?
सिद्धार्थ ने धीरे से हंस का तीर निकाला। तीर निकलते ही हंस को चैन मिला और वह प्यार से उनकी गोद में चिपक गया। सिद्धार्थ ने सखा से पूछा — क्या तुम्हारा मन इसे मारने को करता है? सखा बोला — नहीं कुमार, मैं इसे नहीं मार सकूँगा। फिर सिद्धार्थ ने सखा को दौड़कर राजवैद्य (राजा के वैद्य) से मरहम लाने भेजा।
तभी राजकुमार देवदत्त आया। वह खुश था कि उसने एक उड़ते हंस को तीर मारकर गिरा दिया है। उसने हंस माँगा — यह मेरा है, इसके शरीर में मेरा तीर लगा है! हंस देवदत्त को देखकर चीखा और सिद्धार्थ की गोद में दुबक गया। सिद्धार्थ ने कहा — तुमने इसे मारा है, पर मैंने इसे बचाया है, इसलिए यह हंस मेरा है। मैं तुम्हें नहीं दूँगा।
देवदत्त बोला — तुम राजकुमार हो, इसलिए धौंस जमाना (रौब दिखाना) चाहते हो, पर मैं भी राजकुमार हूँ! इतने में सखा मरहम लेकर लौटा और हंस को मरहम लगाया, तो हंस शांत हो गया। देवदत्त फिर भी हंस लेने पर अड़ा रहा। झगड़ा सुलझ नहीं रहा था, इसलिए सखा ने सुझाव दिया — हमें महाराज के पास चलना चाहिए। देवदत्त गुस्से में शिकायत करने चला गया, और सिद्धार्थ ने कहा — महाराज ही इसका निर्णय करेंगे।
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