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न्याय

राजा का न्याय

नाटक का दूसरा दृश्य पढ़ो और देखो कि राजा कैसा न्याय करते हैं।

आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 9 'न्याय' नाटक का दूसरा दृश्य महाराज शुद्धोदन की सभा में होता है। मंत्री अपने-अपने आसन पर बैठे हैं। प्रतिहारी आकर बताता है कि राजकुमार देवदत्त आना चाहते हैं। देवदत्त आकर कहता है — महाराज, मैं न्याय चाहता हूँ! मैंने उड़ते हंस को तीर से मारा, वह राजकुमार सिद्धार्थ के पास जा गिरा, और अब वे उसे नहीं लौटाते। महाराज प्रतिहारी से सिद्धार्थ को बुलवाते हैं, पर सिद्धार्थ हंस को गोद में लिए खुद ही आ पहुँचते हैं।

महाराज पूछते हैं — देवदत्त कहता है कि हंस उसका है, क्योंकि उसने इसका आखेट (शिकार) किया है। सिद्धार्थ मानते हैं कि आखेट देवदत्त ने ही किया। फिर हंस तुम्हारा कैसे? सिद्धार्थ कहते हैं — देवदत्त ने हंस को मारा है, पर मैंने उसे बचाया है। बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है। सभा में खुशी की आवाज़ उठती है।

महाराज कहते हैं — पर वीर अपना आखेट नहीं छोड़ सकता। सिद्धार्थ उत्तर देते हैं — ठीक है, पर वीर शरणागत को भी नहीं छोड़ सकता! शरणागत यानी वह जो बचने के लिए किसी की शरण में आया हो। हंस मेरी शरण में आ चुका है, मैं उसे नहीं लौटाऊँगा। देवदत्त कहता है कि मैंने पहले मारा था। सिद्धार्थ कहते हैं — पहले मारा था, तभी तो वह मेरी शरण में आया!

महाराज कहते हैं — मंत्री जी, समस्या जटिल (उलझी हुई) है। मंत्री कहते हैं — महाराज, समस्या बड़ी आसान है। वे सिद्धार्थ से हंस को एक आसन पर बैठाने को कहते हैं। फिर पहले देवदत्त से हंस को बुलाने को कहते हैं। देवदत्त पुकारता है, पर हंस डरकर फड़फड़ाता और चीखता है — वह उसके पास नहीं जाता। फिर सिद्धार्थ प्यार से पुकारते हैं — आओ मित्र, मेरी गोद में आ जाओ — और हंस एकदम उड़कर उनकी गोद में आ चिपकता है।

मंत्री कहते हैं — देखिए महाराज, पक्षी ने अपने आप इस प्रश्न का निर्णय कर दिया है; वह सिद्धार्थ के पास रहना चाहता है। महाराज यह निर्णय स्वीकार करते हैं और आज्ञा देते हैं कि हंस राजकुमार सिद्धार्थ के पास रहे। सभा जय-जयकार करती है, देवदत्त गरदन झुका लेता है, और परदा धीरे-धीरे गिर जाता है।

सभा में सिद्धार्थ ने कहा कि बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है; मंत्री ने दोनों से हंस को बुलवाया — हंस देवदत्त से डरा और सिद्धार्थ की गोद में उड़ आया — इसलिए महाराज ने आज्ञा दी कि हंस सिद्धार्थ के पास रहे।

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