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राजस्थान की रजत बूँदें

रेत, खड़िया पट्टी और रेजाणीपानी

कुंई के पानी का भूगोल और विज्ञान समझाना।

कुआँ और कुंई का अंतर. कुआँ ज़मीन के नीचे के भूजल तक पहुँचने के लिए बनता है। पर मरुभूमि में भूजल अकसर खारा होता है, इसलिए बड़े कुओं का पानी पीने लायक नहीं रहता। कुंई न सतह के पानी से भरती है, न भूजल से: वह रेत में समाई वर्षा की नमी को समेटती है।

खड़िया पत्थर की पट्टी. कुछ क्षेत्रों में रेत के नीचे दस-पंद्रह से पचास-साठ हाथ की गहराई पर खड़िया पत्थर की पट्टी चलती है। यह पट्टी वर्षा के पानी को नीचे के खारे भूजल में मिलने नहीं देती, इसलिए ऊपर की रेत में मीठी नमी टिकी रहती है।

रेत का गुण. रेत के कण एक-दूसरे से चिपकते नहीं, इसलिए सूखने पर दरारें नहीं पड़तीं और भीतर की नमी भाप बनकर उड़ नहीं पाती। लेखक का सुंदर वाक्य है: रेत के कणों का 'बिखरे रहने में ही संगठन' है।

कुंई का काम. कुंई का खाली पेट चारों ओर की रेत में फैली नमी को फिर से बूँदों में बदलता है; बूँदें रिसकर कुंई में जमा होती हैं। लेखक के शब्दों में: खारे पानी के सागर में अमृत जैसा मीठा पानी।

पानी के तीन रूप (राजस्थान के समाज ने पहचाने):

  • पालरपानी: सीधे बरसात से मिलने वाला, सतह पर बहने वाला पानी (नदी, तालाब में रुकने वाला)।
  • पातालपानी: ज़मीन के बहुत नीचे का भूजल, जो कुओं से निकाला जाता है।
  • रेजाणीपानी: इन दोनों के बीच का, रेत में समाया हुआ पानी। वर्षा को 'रेजा' में नापा जाता है, यानी धरती में कितने अंगुल पानी समाया: 'पाँच अंगुल रेजो' वर्षा की नाप है।

नया उदाहरण. एक स्पंज को हल्का गीला करके प्लेट पर रख दीजिए और बीच में छोटा गड्ढा बना दीजिए: थोड़ी देर में आसपास की नमी रिसकर गड्ढे में बूँदें बना देती है। कुंई रेत के 'स्पंज' से ठीक ऐसे ही पानी निकालती है।

खारे सागर में मीठे पानी का द्वीप।

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