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आलो-आँधारि

तातुश: किताब, कॉपी और नया घर

तातुश की भूमिका और बेबी के लेखन की शुरुआत समझाना।

तातुश. साहब बेबी का बहुत ध्यान रखते, उसके बच्चों को स्कूल भिजवाते। वे कहते: मुझे अपना बाप, भाई, माँ, बंधु, सब समझो। उनके बच्चे उन्हें 'तातुश' कहते थे, इसलिए उन्होंने बेबी से भी यही कहने को कहा। उनके चेहरे पर सदा हँसी रहती, और वे धीरे-धीरे बोलते थे।

किताबों से पहचान. एक दिन अलमारी की किताबें साफ़ करते हुए बेबी एक बांग्ला किताब पलट रही थी। तातुश के पूछने पर उसने रवींद्रनाथ, नज़रुल, शरत्चंद्र जैसे लेखकों के नाम बताए। तातुश ने उसे तसलीमा नसरीन की 'आमार मेये बेला' पढ़ने को दी।

कॉपी और पेन. फिर तातुश ने उसे कॉपी और पेन दिया और कहा: अपनी जीवन-कहानी रोज़ थोड़ा-थोड़ा लिखो। यहीं से बेबी के लेखन की शुरुआत हुई।

घर की मुश्किलें. किराये के घर में शौचालय और पानी की कमी थी; मकान-मालकिन ताने देती, और मालिक के बेटे का व्यवहार अनुचित था। बेबी वह घर छोड़ना चाहती थी।

बस्ती का टूटना. एक दिन बेबी की बस्ती बुलडोज़र से तोड़ दी गई। उसे बच्चों के साथ सारी रात खुले में, ओस में काटनी पड़ी; उसके अपने भाइयों ने उसकी ख़बर तक नहीं ली। भोला दा उस रात साथ रहे और सुबह उनकी मदद से बेबी तातुश के घर की छत वाले कमरे में आ गई।

नया उदाहरण. किसी स्कूल का चौकीदार रोज़ अख़बार ध्यान से पढ़ता हो; एक शिक्षक यह देखकर उसे पुस्तकालय की किताबें देने लगें और डायरी लिखने को कहें: एक छोटा-सा प्रोत्साहन किसी का पूरा जीवन बदल सकता है।

किसी का प्रोत्साहन जीवन बदल देता है।

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