ईदगाह
घर वापसी: खिलौनों का अंत और अमीना के आँसू
कहानी के अंत का भाव समझाना।
गाँव वापसी. ग्यारह बजे मेले वाले गाँव लौटते हैं, और खिलौनों का अंत शुरू होता है। प्रेमचंद यहाँ हल्के-फुल्के हास्य से लिखते हैं:
- मोहसिन का भिश्ती उसकी छोटी बहन के हाथ से गिरकर टूट जाता है; भाई-बहन में झगड़ा होता है और ऊपर से अम्मा की डाँट।
- नूरे का वकील पटरे के 'सिंहासन' पर बिठाया जाता है; उसे पंखा झलते-झलते वह गिरकर मिट्टी हो जाता है।
- महमूद का सिपाही टोकरी से गिरता है, एक टाँग टूटती है, फिर 'इलाज' में दूसरी भी; अब वह 'संन्यासी' बनकर बैठा-बैठा पहरा देता है, और कभी बाट (तौल) का काम भी करता है।
अमीना का गुस्सा. हामिद की आवाज़ सुनकर अमीना दौड़ी आती हैं, उसे गोद में उठाकर प्यार करती हैं, पर हाथ में चिमटा देखकर चौंक जाती हैं: बच्चे ने दोपहर तक कुछ खाया-पिया नहीं, और ले आया चिमटा! वे गुस्से में छाती पीटने लगती हैं।
मूक स्नेह. हामिद अपराधी-भाव से कहता है: 'तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे ले लिया।' यह सुनते ही अमीना का गुस्सा मूक स्नेह में बदल जाता है: बच्चे में इतना त्याग, इतना सद्भाव, इतना विवेक!
भूमिकाएँ उलटीं. कहानी का अंत अनोखा है: बच्चे हामिद ने बूढ़े की तरह त्याग किया, और बूढ़ी अमीना बच्ची की तरह रोकर दुआएँ देने लगीं, आँसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती हुई। हामिद इन आँसुओं का रहस्य नहीं समझता।
नया उदाहरण. कोई बेटी अपनी पहली तनख़्वाह से अपने लिए फ़ोन लेने के बजाय पिता के घुटनों के इलाज का ख़र्च दे दे, और पिता कुछ कह न पाएँ, बस आँखें भर आएँ: वही उलटी भूमिकाएँ, वही मूक स्नेह।
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