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दोपहर का भोजन

अमरकांत और 'दोपहर का भोजन'

लेखक का परिचय और कहानी की शैली समझाना।

लेखक. अमरकांत (सन् 1925-2014) का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के नगरा गाँव में हुआ; उनका मूल नाम श्रीराम वर्मा था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. किया।

  • शुरुआत पत्रकारिता से की: 'सैनिक', 'अमृत पत्रिका', 'भारत' जैसे पत्रों के संपादकीय विभागों में काम किया, और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े।
  • वे 'नयी कहानी' आंदोलन के प्रमुख कहानीकार हैं। शहर और गाँव का यथार्थ, ख़ासकर मध्यवर्ग की तकलीफ़ें, दिखावा और संवेदनहीनता उनके विषय हैं।
  • उपन्यास 'इन्हीं हथियारों से' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, और सन् 2009 में श्रीलाल शुक्ल के साथ संयुक्त रूप से ज्ञानपीठ पुरस्कार।

शैली. अमरकांत की भाषा सादी है; वे चमत्कार दिखाने की कोशिश नहीं करते। जीवन जैसे चलता है, वैसे ही कहानी चलती है। आँचलिक शब्द और मुहावरे कहानी को जीवंत बनाते हैं।

कहानी. 'दोपहर का भोजन' गरीबी से जूझते एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है। पूरा परिवार भविष्य की उम्मीद पर टिका है, और माँ सिद्धेश्वरी अपने घर को गरीबी की आँच से बचाने के लिए छोटे-छोटे झूठ बोलती है। कहानी में कोई बड़ी घटना नहीं, बस एक दोपहर का खाना, पर उसी में पूरे परिवार का दुख दिख जाता है।

नया उदाहरण. किसी फ़ोटो में पूरा परिवार मुस्कुराता दिखे, पर ध्यान से देखें तो कपड़े घिसे, घर ख़ाली और चेहरों पर थकान: अमरकांत की कहानी भी ऐसी ही सादी तसवीर है, जिसमें बिना शोर के पूरा सच झलक जाता है।

जैसा जीवन, वैसी कहानी।

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