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सूरदास — खेलन में को काको गुसैयाँ; मुरली तऊ गुपालहिं भावति

पद 1: 'खेलन में को काको गुसैयाँ'

पद का अर्थ और बाल-मनोविज्ञान समझाना।

'खेलन में को काको गुसैयाँ'. खेल में कौन किसका स्वामी (गुसाईं)? यानी खेल में सब बराबर हैं।

हार और रूठना. 'हरि हारे जीते श्रीदामा': खेल में कृष्ण हार गए और श्रीदामा जीत गए, फिर भी कृष्ण बेवजह गुस्सा (रिसैयाँ) कर रहे हैं।

साथियों के तर्क. ग्वाल-बाल कृष्ण को खरी-खरी सुनाते हैं:

  • 'जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं': जाति-पाँति में तुम हमसे बड़े नहीं हो।
  • 'नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ': हम तुम्हारी छाया में (तुम्हारे सहारे) नहीं रहते।
  • तुम इतना अधिकार इसलिए जताते हो कि तुम्हारे घर गायें ज़्यादा हैं, यानी तुम धनी घर के हो। पर खेल में यह नहीं चलेगा।

'रूठहि करै तासौं को खेलै'. जो रूठे, उसके साथ कौन खेले? ग्वाल-बाल जहाँ-तहाँ बैठ जाते हैं, यानी खेल बंद।

अंत. कृष्ण तो खेलना चाहते हैं, इसलिए नंद बाबा की दुहाई (क़सम) देकर दाँव दे देते हैं: मान लेते हैं कि हार गए और अब उनकी बारी है। यहाँ भगवान भी एक साधारण बच्चे की तरह रूठते और मान जाते हैं: यही सूर का बाल-मनोविज्ञान है।

नया उदाहरण. मोहल्ले के क्रिकेट में जिसका बल्ला हो, वह आउट होने पर कह दे 'मैं आउट नहीं', तो बाकी बच्चे बल्ला छोड़कर बैठ जाएँ; खेलना है तो उसे भी नियम मानने पड़ते हैं।

खेल में सब बराबर।

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