नागार्जुन — बादल को घिरते देखा है
नागार्जुन: जनकवि और घुमक्कड़
कवि और कविता का परिचय देना।
कवि. नागार्जुन (सन् 1911-1998) बिहार के मधुबनी ज़िले के तरौनी गाँव के निवासी थे; उनका जन्म ननिहाल सतलखा (दरभंगा) में हुआ। मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था।
- सन् 1936 में वे श्रीलंका गए और वहाँ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली; 1938 में लौटे। फक्कड़पन और घुमक्कड़ी उनके जीवन की पहचान है; राजनीतिक कामों के लिए वे कई बार जेल भी गए।
- अपनी मातृभाषा मैथिली में वे 'यात्री' नाम से लिखते थे; संस्कृत और बांग्ला में भी कविता की। मैथिली संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
- विषय: लोकजीवन, प्रकृति और समकालीन राजनीति; उनमें धारदार व्यंग्य और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता है, इसलिए उनकी कविता चौपाल से विद्वानों तक आदर पाती है। उपन्यास: 'बलचनमा', 'वरुण के बेटे' आदि।
यह कविता. 'बादल को घिरते देखा है' बादल के कोमल और कठोर, दोनों रूप दिखाती है: हिमालय की घाटियाँ, झीलें, झरने, देवदार के वन और किन्नरों का जीवन। इसमें संस्कृत कवि कालिदास और हिंदी कवि निराला वाली प्रकृति-चित्रण की परंपरा की झलक है। भाषा में तत्सम शब्द भी हैं और बोली जैसा सहज प्रवाह भी।
नया उदाहरण. कोई यात्री पहाड़ों से लौटकर अपनी डायरी में लिखे: 'मैंने बर्फ़ पर सुबह की धूप देखी है, मैंने झील में हंस देखे हैं': हर पंक्ति 'मैंने देखा है' से शुरू हो, क्योंकि वह आँखों देखा है। नागार्जुन की कविता ऐसी ही गवाही है।
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