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नागार्जुन — बादल को घिरते देखा है

हिम-शिखर, मानसरोवर और हंस

आरंभिक दृश्यों और टेक की भूमिका समझाना।

बर्फ़ीले शिखर. 'अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है': निर्मल (अमल), सफ़ेद (धवल) पर्वत-शिखरों पर कवि ने बादलों को घिरते देखा है।

ओस और कमल. बादलों से गिरते छोटे-छोटे मोतियों जैसे ठंडे ओस-कण (तुहिन कण) मानसरोवर के सुनहरे कमलों पर गिरते हैं: बहुत कोमल और सुंदर चित्र।

हिमालय के कंधे. 'तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी-बड़ी कई झीलें हैं': ऊँचे हिमालय को एक विशाल मनुष्य की तरह दिखाया गया है, जिसके कंधों पर झीलें रखी हों (मानवीकरण)। इन झीलों का पानी साँवला-नीला है।

हंस. मैदानों की वर्षा की उमस से बेचैन होकर आए हंस इन झीलों में तैरते हुए कमल-नाल के कड़वे-मीठे तंतु खोजते हैं।

टेक. हर अंश के अंत में 'बादल को घिरते देखा है' लौटती है। यह टेक कविता को लय देती है, सब दृश्यों को एक सूत्र में बाँधती है, और बार-बार याद दिलाती है कि यह प्रत्यक्ष अनुभव है।

नया उदाहरण. सर्दियों में किसी पहाड़ी कस्बे में सुबह खिड़की खोलते ही दिखे कि बादल नीचे घाटी में रुई की तरह भरे हैं और ऊपर बर्फ़ीली चोटी धूप में चमक रही है: ऐसा दृश्य शब्दों में उतारना ही नागार्जुन का कौशल है।

मोती-सी ओस, सुनहरे कमल।

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