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नागार्जुन — बादल को घिरते देखा है

चकवा-चकई और कस्तूरी मृग

दोनों प्रसंगों का भाव और प्रतीक समझाना।

वसंत की सुबह. धीमी-धीमी हवा (मंद अनिल) बह रही है; उगते सूरज (बालारुण) की कोमल किरणें हैं, और आसपास के शिखर सुनहरे हो उठे हैं।

चकवा-चकई. एक लोक-विश्वास है कि चकवा-चकई (एक पक्षी-जोड़ा) को रात भर अलग रहने का शाप मिला है; वे रात भर बेबस होकर एक-दूसरे को पुकारते हैं।

  • सुबह होते ही उनका क्रंदन (रोना) बंद हो जाता है, और मानसरोवर के तट पर काई की हरी दरी पर वे 'प्रणय-कलह' करते हैं: प्रेम-भरी छेड़छाड़। वियोग के बाद मिलन का आनंद।

कस्तूरी मृग. बर्फ़ीली घाटी में बहुत ऊँचाई पर एक युवा कस्तूरी मृग अपनी ही नाभि से उठती मादक सुगंध के पीछे दौड़ता है। सुगंध का स्रोत न मिलने पर वह ख़ुद पर चिढ़ता है।

  • यह प्रतीक है: जो चीज़ भीतर है, उसे मनुष्य बाहर खोजता फिरता है। यही भाव कबीर की साखी में भी है: कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ़े बन माहिं।

नया उदाहरण. कोई व्यक्ति सुकून के लिए एक शहर से दूसरे शहर, एक नौकरी से दूसरी नौकरी भटकता रहे, और बाद में समझे कि शांति तो अपने मन को समझने से मिलनी थी: कस्तूरी मृग जैसी खोज।

जो भीतर है, उसे बाहर मत ढूँढ़ो।

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