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ज्योतिबा फुले

स्त्री-समानता और 'महात्मा'

स्त्री-अधिकारों पर फुले के काम और उनकी विनम्रता समझाना।

स्त्री-शिक्षा का प्रश्न. फुले लिखते हैं कि पुरुषों ने स्त्री-शिक्षा के दरवाज़े इसलिए बंद रखे ताकि स्त्री अपने मानवीय अधिकार न समझ सके। स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग नियम बनाना पक्षपात है।

नई विवाह-विधि. फुले ने एक नई विवाह-विधि बनाई, जिसमें पुरोहित की ज़रूरत ही नहीं रही। स्त्री को गुलाम बताने वाले मंत्र हटाकर उन्होंने सरल, नए मंगलाष्टक (विवाह के समय पढ़े जाने वाले मंत्र) लिखे।

  • इन मंगलाष्टकों में वधू वर से शपथ माँगती है कि उसे स्त्री का अधिकार और स्वतंत्रता मिलेगी। यह उस समय हर स्त्री के मन की आकांक्षा थी।

'महात्मा' की उपाधि. 1888 में जब फुले को 'महात्मा' की उपाधि दी गई, तो उन्होंने कहा: मेरे संघर्ष को पूर्णविराम मत दीजिए। जब व्यक्ति मठाधीश बन जाता है, तब वह संघर्ष नहीं कर सकता; इसलिए मुझे साधारण जन ही रहने दीजिए।

कथनी और करनी. फुले की सबसे बड़ी विशेषता: जो कहते, वही करते। स्त्री-शिक्षा की शुरुआत उन्होंने अपने घर से की: अपनी पत्नी सावित्री बाई को पढ़ाकर।

नया उदाहरण. कोई अधिकारी पर्यावरण पर भाषण देने से पहले ख़ुद साइकिल से दफ़्तर आने लगे, और अपने घर में पानी बचाने की व्यवस्था करे: लोग उसकी बात इसीलिए मानते हैं कि उसने शुरुआत अपने से की।

जो कहा, वही किया।

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