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उसकी माँ

लाल और चाचा: दो सिरे

विवाद के तर्क और लाल के विचार समझाना।

लाल. लाल लंबा, सुडौल, तेजस्वी युवक है। चाचा के आरोप पर वह कहता है कि वह किसी षड्यंत्र में नहीं है, पर 'पशु-हृदय परतंत्रता' (क्रूर गुलामी) देखकर उसका मन उबल उठता है।

चाचा की सलाह. यह सब 'बक-बक' बेकार है; पढ़ो, कमाओ, पहले अपने घर का उद्धार करो, फिर सरकार के सुधार की सोचना।

दो सिरे. लाल साफ़ कहता है: आप कट्टर राजभक्त हैं, मैं कट्टर राजविद्रोही; हम दो अलग सिरों पर हैं। आप अपना पद नहीं छोड़ सकते, मैं अपना नहीं।

  • उसकी 'कल्पना': जो व्यवस्था लोगों के नाश पर जीती है, उसका अंत हो, और उसमें उसका भी हाथ हो।
  • चाचा कहता है कि तुम्हारे हाथ कमज़ोर हैं। लाल का उत्तर: नष्ट होना तो संसार का नियम है; कर्म के समय हमारी भुजाएँ दुर्बल नहीं, भगवान की सहस्र भुजाओं की सखियाँ हैं।

जानकी की नज़र. जानकी इस बहस को गंभीरता से नहीं लेती: 'तू तो चाचा से जूझने लगा।' वह लाल से चाचा की बात मान लेने को कहती है; उसे राजनीति नहीं, बस बेटे का भला दिखता है।

नया उदाहरण. घर में पिता चाहें कि बेटी सुरक्षित सरकारी नौकरी करे, और बेटी गाँवों में जाकर सामाजिक काम करना चाहे: दोनों अपनी जगह ईमानदार हैं, पर दो अलग सिरों पर खड़े हैं।

डर से कर्तव्य नहीं छोड़ना।

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