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उसकी माँ

गिरफ़्तारी, फाँसी और माँ का अंत

कहानी के मार्मिक अंत और उसके संदेश को समझाना।

गिरफ़्तारी. एक दिन पुलिस लाल का घर घेर लेती है; बारह घंटे तलाशी होती है, और लाल तथा उसके बारह-पंद्रह साथी पकड़े जाते हैं। जानकी बुलाने पर भी नहीं आती: वह 'हवालात के बच्चों' के लिए पराँठे और हलवा बना रही है।

मुकदमा. लगभग एक वर्ष मुकदमा चलता है। सरकार के डर से कोई ढंग का वकील तक नहीं मिलता। जानकी लोटा, थाली, ज़ेवर बेचकर रोज़ खाना पहुँचाती है, वकीलों के आगे गिड़गिड़ाती है, और सूखकर काँटा हो जाती है।

फ़ैसला. ऊँची अदालत लाल, बंगड़ और दो और लड़कों को फाँसी की सज़ा देती है, और दस को सात से दस वर्ष की कड़ी सज़ा। बेड़ियाँ बजाते लड़के मुसकराकर पूछते हैं: 'आएगी न, माँ?'

अकेली माँ. शहर के लोग, और चाचा भी, डर के मारे जानकी से दूर रहते हैं। चाचा तो पुलिस अफ़सर की आँखें याद करके अपनी मेज़िनी की किताब पर लिखा लाल का नाम रबर से मिटाने लगता है: डर ने उसके भीतर के इंसान को भी मिटा दिया।

अंत. लाल की आख़िरी चिट्ठी पढ़कर जानकी पत्थर-सी चुप हो जाती है। रात भर उसके मुँह से 'माँ...' की पुकार सुनाई देती है, और सुबह वह दरवाज़े पर, हाथ में चिट्ठी लिए, इस दुनिया से जा चुकी होती है।

  • कहानी का संदेश: आज़ादी की लड़ाई में केवल क्रांतिकारी ही नहीं, उनकी माँएँ भी बलिदान हुईं; और डर से चुप रहने वाले लोग भी उस अन्याय में हिस्सेदार बने।

नया उदाहरण. किसी सैनिक की माँ हर साल उसकी पुरानी चिट्ठियाँ पढ़ती रहे, और पूरा गाँव उसे 'वीर की माँ' कहे: इतिहास वीरों को याद रखता है, पर उनके पीछे खड़ी माँओं का दुख अकसर अनकहा रह जाता है।

बेटा फाँसी पर, माँ इंतज़ार में।

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