भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
भारतेंदु हरिश्चंद्र: नई चाल की हिंदी
भारतेंदु और 'भारतेंदु युग' का परिचय देना।
लेखक. भारतेंदु हरिश्चंद्र (सन् 1850-1885) का जन्म काशी में हुआ। किशोरावस्था में ही देश की दुर्दशा देखकर वे व्याकुल हुए, और हिंदी में पुनर्जागरण (नवजागरण) की चेतना के नायक बने। उनके समय को 'भारतेंदु युग' कहा जाता है।
- उन्होंने 'कविवचनसुधा' और 'हरिश्चंद्र मैगज़ीन' (बाद में 'हरिश्चंद्र चंद्रिका') पत्रिकाएँ निकालीं; स्त्री-शिक्षा के लिए 'बाला बोधिनी'।
- मौलिक नाटक: 'भारत दुर्दशा', 'अंधेर नगरी', 'श्री चंद्रावली', 'नील देवी'; अनूदित: 'सत्य हरिश्चंद्र', 'मुद्राराक्षस' आदि।
- उनके अनुसार सन् 1873 में 'हिंदी नई चाल में ढली': यहीं से खड़ी बोली गद्य की यात्रा तेज़ हुई। हिंदी में नाटक और निबंध, दोनों विधाओं की शुरुआत का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
यह पाठ. यह बलिया के ददरी मेले में दिया गया उनका भाषण (व्याख्यान) है। इसमें अंग्रेज़ी शासन पर व्यंग्य भी है और अंग्रेज़ों की मेहनत का आदर भी; आलस और रूढ़ियों पर चोट है, और श्रम, आत्मबल, एकता का आह्वान।
- भाषण होने के कारण इसकी भाषा बोलचाल की है: श्रोताओं को सीधे पुकारा गया है, ब्रज के रूप (करैं, कहैं) आते हैं, और बीच-बीच में कहानियाँ, कहावतें और दोहे, ताकि सुनने वाले बँधे रहें।
नया उदाहरण. किसी स्कूल के वार्षिकोत्सव में प्रधानाचार्य जब भाषण देते हैं, तो वे बच्चों से 'तुम' कहकर बात करते हैं, छोटे क़िस्से सुनाते हैं, बीच में हँसाते हैं; वही बात लिखित रिपोर्ट में बिलकुल अलग, औपचारिक भाषा में होती।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.