कबीर — अरे इन दोहुन राह न पाई; बालम, आवो हमारे गेह रे
पद 1: 'अरे इन दोहुन राह न पाई'
पद का भाव और व्यंग्य समझाना।
मूल भाव. 'अरे इन दोहुन राह न पाई।' कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान, दोनों ने ईश्वर तक पहुँचने की सही राह नहीं पाई, क्योंकि दोनों दिखावे में उलझे हैं।
हिंदुओं पर व्यंग्य. 'हिंदू अपनी करै बड़ाई गागर छुवन न देई।' हिंदू अपनी बड़ाई करता है और अपने पानी के घड़े (गागर) को किसी को छूने तक नहीं देता: यह छुआछूत है। पर कबीर कहते हैं कि ऐसे घमंडी लोगों का अपना आचरण कई बार गिरा हुआ होता है।
मुसलमानों पर व्यंग्य. कबीर कहते हैं कि पीर-औलिया कहलाने वाले भी जीव-हत्या और खान-पान के दिखावे में लगे हैं, और अपने रीति-रिवाज़ों को ही धर्म समझ बैठे हैं।
निष्कर्ष. 'हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।' कबीर ने दोनों की धार्मिकता को परख लिया। उनका निशाना कोई धर्म नहीं, बल्कि पाखंड, कट्टरता और भेदभाव है।
- अंत में प्रश्न है: 'कौन राह ह्वै जाई?' (फिर रास्ता कौन-सा है?) कबीर का उत्तर उनके पूरे काव्य में है: बाहरी पहचान नहीं, शुद्ध आचरण और प्रेम की राह।
- कबीर हिंदू-मुसलमान की ही बात इसलिए करते हैं कि उनके समय के समाज में ये दो बड़े समुदाय थे, और दोनों के बीच का तनाव सबसे गहरा था।
नया उदाहरण. कोई व्यक्ति मंदिर या मस्जिद में बहुत दान दे, पर अपने घर काम करने वाले को समय पर मज़दूरी न दे: कबीर ऐसे ही दोहरेपन पर सवाल उठाते हैं, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
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