कबीर — अरे इन दोहुन राह न पाई; बालम, आवो हमारे गेह रे
पद 2: 'बालम, आवो हमारे गेह रे'
पद का भाव, प्रतीक और शिल्प समझाना।
विरहिणी कबीर. इस पद में कबीर स्वयं को एक विरहिणी पत्नी के रूप में रखते हैं और 'बालम' (प्रियतम, यानी परमात्मा) को पुकारते हैं: 'बालम, आवो हमारे गेह रे' (प्रिय, मेरे घर आओ)। 'तुम बिन दुखिया देह रे': तुम्हारे बिना शरीर दुखी है।
लाज और स्नेह. सब कहते हैं कि वह प्रिय की 'नारी' (पत्नी) है, पर मिलन न होने से उसे लाज लगती है। जब तक प्रिय ने दिल से नहीं लगाया, तब तक कैसा स्नेह?
विरह की दशा. 'अन्न न भावै नींद न आवै': विरह में न भूख लगती है, न नींद आती है; घर हो या वन, कहीं धीरज नहीं।
प्यासे को पानी. 'कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे।' प्रेमिका के लिए प्रिय वैसे ही ज़रूरी है जैसे प्यासे के लिए पानी। वह किसी परोपकारी को खोजती है जो उसकी बात प्रिय तक पहुँचा दे; अंत में कबीर कहते हैं कि वे बेहाल हो गए हैं और प्रिय के दर्शन के बिना जीना कठिन है।
शिल्प.
- निराकार ईश्वर को प्रिय और आत्मा को पत्नी बनाकर प्रेम की तड़प कहना 'रहस्यवाद' है; यह सूफ़ी परंपरा जैसा है।
- इस पद में निर्गुण कवि कबीर ईश्वर को साकार प्रिय की तरह पुकारते हैं, इसलिए यह भाव प्रेम की ओर झुकता है।
- हर पंक्ति के अंत में 'रे' की टेक से पद गेय (गाने योग्य) बन जाता है।
नया उदाहरण. सीमा पर तैनात सैनिक की पत्नी का हाल सोचिए: त्योहार पर भी मन न लगे, खाना अच्छा न लगे, फ़ोन की हर घंटी पर उम्मीद जगे। कबीर ने इसी गहरी प्रतीक्षा की भाषा में ईश्वर से मिलन की तड़प कही है।
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