रामचंद्र शुक्ल — प्रेमघन की छाया-स्मृति
भारतेंदु के प्रति बाल-मन
पिता का प्रभाव, हरिश्चंद्र वाली भ्रांति, प्रेमघन की झलक और 'निस्संदेह' मंडली समझाना।
पिता का प्रेम. शुक्ल जी के पिता फ़ारसी और पुरानी हिंदी कविता के प्रेमी थे। वे रात को घर वालों को 'रामचरितमानस' और 'रामचंद्रिका' पढ़कर सुनाते थे।
हरिश्चंद्र का नाम. बालक का मन राजा हरिश्चंद्र और कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र को एक ही समझता था। यह नाम उसके मन में एक मिठास भर देता था।
प्रेमघन की झलक. मिर्जापुर में बच्चों की एक टोली कवि बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' का घर देखने गई। लताओं के बीच, बाल बिखेरे, एक मूर्ति खड़ी दिखी, और पल भर में ओझल हो गई। वह प्रेमघन थे।
पाठक जी. जब पिता किताबें छिपाने लगे, तो लेखक पाठक जी के पुस्तकालय से पढ़ने लगे। काशी में भारतेंदु के घर के सामने पाठक जी से उनकी गहरी मित्रता हुई।
'निस्संदेह' लोग. लेखक की मित्र-मंडली शुद्ध हिंदी बोलती थी। उर्दू बोलने वाले पड़ोसियों ने उन्हें मज़ाक में 'निस्संदेह' लोग नाम दे दिया, क्योंकि वे बात-बात पर यह शब्द बोलते थे। घर, पुस्तकालय और मित्रों ने मिलकर लेखक के मन में हिंदी का प्रेम पक्का किया।
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