रामचंद्र शुक्ल — प्रेमघन की छाया-स्मृति
चौधरी साहब: एक हिंदुस्तानी रईस
एकादशी, लैम्प, वामनाचार्यगिरि और घनचक्कर के प्रसंगों से चौधरी साहब का व्यक्तित्व समझाना।
'एक पुरानी चीज़'. मित्र-मंडली प्रेमघन (चौधरी साहब) को 'एक पुरानी चीज़' मानती थी, पर उस नज़र में प्रेम और कुतूहल (उत्सुकता) दोनों थे।
हिंदुस्तानी रईस. वे खासे रईस थे: त्योहारों पर घर में नाच-रंग, कंधों तक लंबे बाल, और पीछे-पीछे पान की तश्तरी लिए एक लड़का।
वक्र बातें. उनकी बातों में एक विलक्षण वक्रता (टेढ़ापन, चतुराई) थी। एक बार उन्होंने एक पंडित जी से पूछा: 'जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?' यानी शब्दों को उलटकर मज़ा लेना।
बनाना और बनना. वे लोगों को बनाते (मज़ाक उड़ाते) थे, तो लोग भी उन्हें बनाते थे। कवि वामनाचार्यगिरि ने उन पर खंभे वाला एक कवित्त कस दिया।
नागरी और मीरजापुर. वे 'नागरी' को भाषा मानते थे (केवल लिपि नहीं), और 'मीरजापुर' लिखते थे, जिसका अर्थ वे 'लक्ष्मीपुर' करते थे। इन हास्य प्रसंगों से प्रेमघन का रंगीन, जीवंत व्यक्तित्व सामने आता है।
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