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अपू के साथ ढाई साल

सत्यजित राय और अपू की खोज

सत्यजित राय और फ़िल्म की शुरुआत की कठिनाइयाँ समझाना।

फ़िल्मकार. सत्यजित राय (सन् 1921-1992, कोलकाता) भारतीय सिनेमा को कलात्मक ऊँचाई देने वालों में सबसे आगे हैं। उनकी पहली फ़ीचर फ़िल्म 'पथेर पांचाली' (बांग्ला) सन् 1955 में आई और उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। उन्होंने लगभग तीस फ़ीचर फ़िल्में बनाईं।

  • उनकी ज़्यादातर फ़िल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित हैं; पसंदीदा लेखकों में बांग्ला के विभूति भूषण बंद्योपाध्याय से हिंदी के प्रेमचंद तक हैं। हिंदी में उन्होंने 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'सद्गति' बनाईं।
  • उन्होंने बच्चों और किशोरों के लिए बांग्ला में कहानियाँ भी लिखीं ('प्रो. शंकु के कारनामे', 'सोने का किला')। सम्मान: फ़्रांस का लेजन डी ऑनर, जीवन भर की उपलब्धि पर ऑस्कर, और भारतरत्न।
  • यह संस्मरण 'पथेर पांचाली' बनाने के अनुभवों का है; बांग्ला से हिंदी अनुवाद विलास गिते ने किया है।

ढाई साल क्यों? राय तब एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी करते थे; फ़ुर्सत मिलने पर ही शूटिंग होती। उनके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे: पैसे ख़त्म होते तो शूटिंग रुक जाती, फिर पैसे जुटने का इंतज़ार।

अपू की खोज. छह साल का सही लड़का नहीं मिल रहा था। अख़बार में इश्तहार दिया; रासबिहारी एवेन्यू में किराए के कमरे में बच्चे इंटरव्यू देने आए।

  • एक 'लड़के' की गर्दन पर लगे पाउडर से राय को शक हुआ; नाम बताया 'टिया'। पिता ने मान लिया कि वह उनकी बेटी है, जिसके बाल कटवाकर वे भूमिका की आशा में ले आए थे।
  • आख़िर राय की पत्नी ने पड़ोस की छत पर एक लड़का देखा: सुबीर बनर्जी, जो 'पथेर पांचाली' का अपू बना।

कलाकारों का साथ. इंदिरा ठाकरुन की भूमिका करने वाली अस्सी साल की चुन्नीबाला देवी पूरे ढाई साल काम कर सकीं, यह राय अपना सौभाग्य मानते हैं।

नया उदाहरण. कोई स्कूल नाटक की तैयारी महीनों चलाए, और बीच में मुख्य कलाकार का गला बैठ जाए या वह किसी दूसरे शहर चला जाए: लंबी तैयारी में कलाकारों का बने रहना भी किस्मत की बात है।

पैसे कम, लगन पूरी।

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