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भारति, जय, विजयकरे!

निराला और भारती की जय

निराला के बारे में जानिए और कविता का पहला चित्र समझिए।

कवि. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' बंगाल के महिषादल में जन्मे (पुस्तक के अनुसार 1899), पर मूल रूप से गढ़ाकोला (उन्नाव, उत्तर प्रदेश) के थे। स्कूली पढ़ाई नौवीं तक हुई; संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी उन्होंने खुद पढ़कर सीखी। देहांत 1961 में। प्रमुख काव्य: अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते।

मुक्त छंद, पर यह कविता नहीं. छायावाद के कवियों में मुक्त छंद (बिना बँधी लय और तुक वाली कविता) सबसे पहले निराला ने अपनाया; दुखी और उपेक्षित लोगों के लिए उनकी कविता में गहरी करुणा है। पर ध्यान दीजिए, यह कविता तुकांत है: विजयकरे-कमलधरे, वसन-सुमन, तुषार-ओंकार। इसे गाकर पढ़िए।

पहले शब्द, फिर कविता. कविता पृष्ठ 167 पर है; पढ़ने से पहले ये शब्द देख लीजिए: शस्य (फसल), शतदल (कमल, सौ पंखुड़ियों वाला), गर्जितोर्मि (गर्जित + ऊर्मि = गरजती लहरें), स्तव (स्तुति, प्रशंसा का गीत), प्रणव (ओम्)। पुस्तक की शब्द-सूची हर शब्द के कई अर्थ देती है; हमें वह अर्थ चुनना है जो पंक्ति में बैठे।

'भारति' के दो अर्थ: सरस्वती (ज्ञान और वाणी की देवी) और भारतमाता। कविता भारत को ज्ञान की देवी जैसी जीवित माँ मानकर उसकी जय बोलती है। 'विजयकरे': विजय दिलाने वाली। 'कनक-शस्य-कमलधरे': सोने जैसी फसलें और कमल धारण करने वाली; यानी धन-धान्य से भरी, खेती और मेहनत से सुंदर धरती।

चरण धोता सागर. नक्शे में देखिए: नीचे लंका है, भारतमाता के पैरों के पास कमल जैसी। गरजती लहरों वाला सागर उनके पवित्र चरण धोता है, और उसकी गर्जना केवल शोर नहीं, कई अर्थों से भरा स्तुति-गीत है। यह कविता आज़ादी से पहले लिखी गई, जब 'भारत की जय' कहना ही अपने आप में देशभक्ति थी।

भारती = सरस्वती भी, भारतमाता भी; सुनहरी फसलें, और चरण धोता सागर।

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