भारति, जय, विजयकरे!
वस्त्र, हार, मुकुट और ओंकार
समझिए कि कवि भारतमाता का शृंगार किन चीज़ों से करते हैं।
वस्त्र. पेड़, घास, वन और लताएँ (बेलें) भारतमाता के वस्त्र (वसन) हैं; उनके आँचल में फूल कढ़ाई की तरह जड़े (खचित) हैं। सोचिए, भारत की हरियाली ही माँ की साड़ी है।
हार. गंगा का चमकता, सफ़ेद (धवल) जल उनके गले का हार है। 'ज्योतिर्जल-कण': रोशनी की तरह चमकते पानी के कण।
मुकुट. हिमालय की सफ़ेद बर्फ़ (हिम-तुषार) उनका मुकुट है: सबसे ऊँचा, सबसे उजला, गौरव का प्रतीक।
प्राण. 'प्रणव' यानी ओंकार (ओम्) भारत के प्राण हैं: उसकी आत्मा ज्ञान और अध्यात्म है।
गूँज और संदेश. यह नाद खुली दिशाओं में सौ मुखों और सौ स्वरों से गूँजता है ('शतमुख-शतरव-मुखरे'): अनेक भाषाएँ, अनेक विचार, एक स्वर। पूरी कविता में कवि की मुख्य भावना देशप्रेम और श्रद्धा है। और एक सीख: अगर प्रकृति ही भारत का शृंगार है, तो उसे बचाना भी देशप्रेम है।
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