झाँसी की रानी
सुभद्रा कुमारी चौहान और 1857 की जवानी
सुभद्रा कुमारी चौहान के बारे में जानिए और कविता का पहला छंद समझिए।
कवयित्री. सुभद्रा कुमारी चौहान (1904–1948) का जन्म प्रयागराज में हुआ। वे कवयित्री होने के साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थीं और दो बार जेल गईं। उनकी कविताओं में देशप्रेम और स्त्रियों की बात खास है, और भाषा इतनी सरल कि लोग उन्हें गाकर याद कर लेते थे।
रचनाएँ: मुकुल, त्रिधारा (कविता); बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी); बच्चों के लिए कदंब का पेड़ और सभा का खेल। 'मुकुल' और 'बिखरे मोती' पर उन्हें दो बार सेकसरिया पुरस्कार मिला, और डाक विभाग ने उन पर टिकट निकाला।
पृष्ठभूमि: 1857. कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर है। पुराने राजघरानों की भौंहें तन गईं (वे गुस्से में आ गए); अत्याचार से थका हुआ 'बूढ़ा' भारत फिर जोश से भर गया। जब आज़ादी छिन गई, तब सबने उसका मोल पहचाना, और सबने फ़िरंगियों (अंग्रेज़ों) को देश से निकालने की ठान ली।
'वह तलवार पुरानी': बरसों से रखी पुरानी वीरता 1857 में फिर चमक उठी।
टेक (बार-बार लौटने वाली पंक्तियाँ). हर छंद के अंत में वही पंक्तियाँ आती हैं, जो आपने शायद पहले भी सुनी हों: यह कहानी बुंदेलखंड के हरबोलों (घूम-घूमकर वीरों की गाथा गाने वाले लोकगायकों) के मुँह से सुनी गई है, और रानी 'मर्दानी' थीं, यानी पुरुषों जैसी बहादुरी से लड़ीं। कविता कथा कहती है और गाने लायक है: घटनाएँ क्रम से आती हैं।
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