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झाँसी की रानी

डलहौजी की हड़प नीति

जानिए कि डलहौजी की हड़प नीति से झाँसी कैसे छिनी।

झाँसी छीनी गई. झाँसी का 'दीप' (राजा) बुझा तो डलहौज़ी खुश हुआ: राज्य हड़पने का अच्छा मौका मिल गया। उसने तुरंत फ़ौज भेजकर किले पर अंग्रेज़ी झंडा फहरा दिया; ब्रिटिश राज 'लावारिस का वारिस' बन बैठा। रानी ने आँसू भरी आँखों से देखा कि झाँसी बिरानी (पराई) हो गई।

हड़प नीति (व्यपगत का सिद्धांत). डलहौज़ी का नियम था: अगर राजा का अपना बेटा न हो, तो गोद लिया बेटा वारिस नहीं माना जाएगा, और राज्य कंपनी का हो जाएगा। रानी के गोद लिए बेटे दामोदर राव को इसी आधार पर ठुकरा दिया गया। यानी झाँसी के पास वारिस था, पर अंग्रेज़ों ने उसे माना नहीं।

दासी बनी महारानी. फ़िरंगी किसी की विनती नहीं सुनता था; जो कभी व्यापारी बनकर दया माँगने आया था (ईस्ट इंडिया कंपनी), अब डलहौज़ी के समय पैर पसार चुका था और राजाओं-नवाबों को ठोकर मार रहा था। इसी पर पंक्ति है: 'रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी': रानियाँ दासी जैसी हो गईं, और जो दासी (व्यापारी कंपनी) थी, वह महारानी बन बैठी। यह लक्ष्मीबाई के खुद को महारानी घोषित करने की बात नहीं है; यह उलटी हो गई स्थिति का व्यंग्य है।

छिने राज्य. दिल्ली, लखनऊ, बिठूर (जहाँ पेशवा क़ैद थे), नागपुर, उदयपुर (यह छत्तीसगढ़ का उदयपुर है, राजस्थान का नहीं), तंजौर, सतारा, कर्नाटक; सिंध, पंजाब और ब्रह्म (आज का म्यांमार/बर्मा) पर भी 'वज्र' गिरा था; बंगाल-मद्रास की भी यही कहानी।

खुला अपमान. रानियाँ-बेगमें दुखी थीं; उनके गहने-कपड़े कलकत्ते के बाज़ार में बिकते, और अंग्रेज़ी अखबार खुलेआम नीलामी छापते: 'नागपुर के ज़ेवर लो, लखनऊ का नौलखा हार लो'। परदे में रहने वाली इज़्ज़त परदेसी के हाथ बिक रही थी।

'लावारिस का वारिस' = हड़प नीति; दया माँगने वाला व्यापारी मालिक बन बैठा।

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