घर की याद
ध्वनि, लोकभाषा और व्याकरण
कविता की ध्वनियाँ, लोकभाषा और व्याकरण पहचानिए।
ध्वन्यात्मक शब्द: झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर: सुनते ही बरसात, पत्ते, हवा और काँपता मन महसूस होते हैं। इसे नाद-सौंदर्य कहते हैं (आवाज़ की सुंदरता)।
लोकभाषा (घर की बोली): चुआ (टपका), छिन (क्षण, पल), फलानी (कोई खास), भौजी (भाभी), बड़ (बरगद), लौकी, बाड़ा। घर की बोली कविता को सहज और अपना-सा बनाती है।
दोहराव: पानी गिरने की पंक्ति, आँखों में घर तैरने की पंक्ति, भाई-बहनों की गिनती, और सावन वाला छंद बार-बार लौटते हैं। ठीक वैसे ही जैसे याद भी लौट-लौटकर आती है।
अलंकार: उपमा: नवनीत-सा उर, पहाड़ जैसी देह। अतिशयोक्ति: एक छिन सौ बरस (एक पल सौ साल जैसा)।
व्याकरण: संज्ञा (पानी, बदन, सावन, बुढ़ापा), सर्वनाम (वह, जिनको, मेरे), विशेषण (बहुत, खुले, एक, सजीले), क्रिया (गिर रहा है, व्यापा, फूट जाए)। 'घर' दूसरी भाषाओं में: गृहम् (संस्कृत), गॅरु (कश्मीरी), बाड़ी (बांग्ला), युम (मणिपुरी), इल्लु (तेलुगु), वीडु (तमिल, मलयालम), मनॆ (कन्नड़)।
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