संवादहीन
ताई और मिट्ठू
कहानी का पहला भाग पढ़िए और ताई तथा मिट्ठू से मिलिए।
लेखक और शीर्षक. शेखर जोशी (1932–2022) अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में जन्मे; 'कोसी का घटवार' और 'दाज्यू' जैसी कहानियों के लिए जाने जाते हैं। शीर्षक को तोड़कर देखिए: संवाद (बातचीत) + हीन (बिना) = जिसके पास बात करने वाला कोई न हो। यह कहानी गाँव में अकेली रह गई एक बूढ़ी स्त्री, ताई, की है।
सूना बड़ा घर. कभी गाँव के इस बड़े घर में बहू-बेटे, नौकर-चाकर और गाय-ढोर सब थे। फिर बेटे-बहू शहरों में बस गए और बेटियाँ ब्याह कर अपने घर चली गईं। खेती और कारोबार दूसरों के हाथ चले गए। ताई अकेली रह गईं: दिन में बस एक बार चूल्हा जलातीं ('दो जून का एक जून'), और व्रत के बहाने वह भी टाल देतीं। खाना उनकी समस्या नहीं था; सूना घर उन्हें काटने को दौड़ता था।
मिट्ठू आया. फिर गनपत कहीं से एक प्यारा पहाड़ी तोता ले आया, और ताई का सारा प्यार उस पर उमड़ पड़ा। ध्यान दीजिए: जो ताई अपने लिए चूल्हा जलाने में आलस करती थीं, वे अब मिट्ठू के लिए नियम से दाल-भात बनाने लगीं, और यह भी जानने लगीं कि किस खेत में हरी मिर्च पकी है और किस पेड़ पर आख़िरी अमरूद बचे हैं।
बातें करने वाला साथी. होशियार मिट्ठू ताई का सिखाया 'राम-राम, सीताराम, हर हर गंगे' दोहराता, सुबह उन्हें जगाता। ताई थककर पूछतीं 'मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?' तो वह जोश से कहता 'कटेगी! कटेगी!!' ताई 'जीते रहो' कहतीं तो वह 'खुश रहो' कहता। वह बस दोहराता था, पर ताई के लिए यह सचमुच की बातचीत थी। कभी झगड़ा भी होता: ताई खीझकर 'मर जा!' कहतीं, तो मिट्ठू भी 'मर जा!' कहता। पड़ोस की बहुएँ बच्चों को लेकर मिट्ठू देखने आतीं, और घर में फिर रौनक लौट आई।
कुंभ और दुविधा. गाँव के लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे। ताई का मन जाने का था, पर मिट्ठू की चिंता उन्हें रोकती। भीड़ में पिंजरा सुरक्षित नहीं रहता, इसलिए मिट्ठू को साथ नहीं ले गईं। आख़िर जगन मास्टर की घरवाली ने ताई के लौटने तक मिट्ठू को रखने का ज़िम्मा लिया, और ताई आँसुओं के साथ विदा हुईं।
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