ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)
पिता की यादें और संस्कार
साक्षात्कार का पहला भाग पढ़िए और जानिए कि लता जी अपने पिता को कैसे याद करती हैं।
यह पाठ एक साक्षात्कार (इंटरव्यू) है: एक व्यक्ति सवाल पूछता है, दूसरा जवाब देता है। सवाल पूछ रहे हैं यतींद्र मिश्र (जन्म 1977, अयोध्या), जो कवि हैं और संगीत-कला के जानकार हैं; जवाब दे रही हैं लता मंगेशकर ('भारत रत्न'), जिनका जन्म इंदौर में हुआ और जिन्होंने पाँच साल की उम्र में पिता से संगीत सीखना शुरू किया। सवालों की हिंदी थोड़ी भारी है, जवाब सीधे और सरल हैं।
पिता का अनुशासन. बचपन में शरारत करने पर पिता (पंडित दीनानाथ मंगेशकर) न डाँटते, न मारते; बस बच्चों को सामने खड़ा करके गंभीरता से देखते। बच्चे खुद गलती समझकर रोने लगते। पिता पूछते 'समझ गए न?' और फिर कहते 'अच्छा, जाओ, बाहर खेलो।' यह डर से ज़्यादा सम्मान का अनुशासन था।
नाटक और संगीत. पिता की ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे से तड़के दो-तीन बजे तक चलते, क्योंकि उनमें पाँच अंक और लंबा रागदारी गायन (शास्त्रीय संगीत) होता था; लोग 'वन्स मोर' कहते। पिताजी एक राग गाते-गाते किसी स्वर को नया 'सा' बनाकर दूसरा राग गा देते, फिर पहले राग में लौट आते। मराठी रंगमंच पर वे पहली बार कर्नाटक और पंजाब का संगीत लाए।
स्वाभिमान की सीख. जिस दिन नाटक न होता, घर में शास्त्रीय संगीत की बैठक होती। पर लता जी कहती हैं कि पिता से उन्होंने सबसे ज़्यादा स्वाभिमान से जीना सीखा: कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। पिता की सीख थी: जो बात सही लगे, उसे करो; किसी के आगे झुकने की ज़रूरत नहीं।
फ़िल्मों का खेल. बचपन में भाई-बहन फ़िल्मों की नकल करते। 'संत तुकाराम' में तुकाराम सशरीर स्वर्ग जाते हैं; तो लता जी गद्दों-तकियों से बने 'स्वर्ग' पर बैठकर गातीं, और मीना, आशा और पंढरीनाथ उनके भक्त बनकर रोते। यह सब पिता से छिपकर होता, क्योंकि वे सिर्फ़ धार्मिक और देशभक्ति की फ़िल्में देखने देते थे।
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