ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)
संघर्ष, लगन और संगीत का युग
पढ़िए कि लता जी ने संघर्ष और लगन से संगीत में अपनी जगह कैसे बनाई।
अभिनय पसंद नहीं. लता जी ने शुरू में छह-सात फ़िल्मों में अभिनय किया, पर उन्हें मेकअप, तेज़ रोशनी और लोगों के सामने रोना-हँसना कभी अच्छा नहीं लगा। सिर्फ़ 'छत्रपति शिवाजी' (हिंदी और मराठी) के लिए उन्होंने खुद कहकर आख़िरी गाने की दो पंक्तियाँ गाईं और परदे पर भी आईं, क्योंकि शिवाजी उन्हें बहुत प्रिय थे।
मेहनत के दिन. उनकी रिकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती; एक स्टूडियो से दूसरे में पूरा दिन निकल जाता। मन में बस एक बात रहती: परिवार की ज़रूरतें कैसे पूरी हों, और कल कितने गाने रिकॉर्ड होने हैं। हालात अच्छे हैं या बुरे, इस पर उनका ध्यान ही नहीं जाता था।
मेडल का सपना. बचपन में उन्होंने पंडित कुमार गंधर्व को काली शेरवानी पर ढेर सारे मेडल लगाकर गाते देखा। (उस ज़माने में कलाकार अपने मेडल पहनकर गाते थे, जैसे उनके पिता भी।) तब से मन में था कि बड़ी होकर उन्हें भी ऐसे मेडल मिलेंगे।
नया युग. 1949-50 में 'आएगा आने वाला' (फ़िल्म 'महल'), 'हवा में उड़ता जाए' ('बरसात') और 'चले जाना नहीं नैन मिला के' ('बड़ी बहन') से फ़िल्मी संगीत का नया दौर शुरू हुआ। तब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए 'आएगा आने वाला' में आवाज़ दूर से पास आती लगे, इसके लिए लता जी हॉल में दूर से दबे पाँव चलकर माइक तक आईं। यह गाना सुनिए: आवाज़ सचमुच दूर से पास आती है।
तकनीक की बात. यतींद्र जी पूछते हैं कि अगर पुराने गाने आज के संगीतकारों (रहमान, जतिन-ललित) ने बनाए होते तो? लता जी कहती हैं: अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन जैसे पुराने संगीतकारों को आज की तकनीक मिलती तो कमाल हो जाता; और नए संगीतकार अगर पुराने दौर में काम करते तो उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ता।
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