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ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)

त्योहार, कोरस और संगीत की शक्ति

जानिए कि लता जी त्योहारों और संगीत की शक्ति के बारे में क्या कहती हैं।

त्योहार उनके घर. लता जी के घर रंगों वाली होली नहीं होती थी: होलिका में मिठाइयाँ और नारियल डाले जाते, अगले दिन उसकी राख एक-दूसरे पर डाली जाती (इसे 'गुड़वड़' कहते), और रंग-पंचमी पर माता-पिता केसर छिड़कते। नवरात्र का पहला दिन गुड़ि पड़वा होता: घर के बाहर गुड़ि बाँधकर बताशों की माला चढ़ाई जाती, राम के अयोध्या लौटने की याद में। एक ही त्योहार, अलग-अलग राज्यों में अलग कारण।

नौशाद साहब और मिठाई. पचास के दशक में वे दीवाली की सुबह पाँच बजे नहा-धोकर बड़े संगीतकारों के घर मिठाई लेकर बधाई देने जातीं। एक बार नौशाद साहब इतनी सुबह उन्हें दरवाज़े पर देखकर डर गए कि कोई मुसीबत तो नहीं! फिर प्यार से बोले: मिठाई तो हम सब संगीतकारों को मिलकर तुम्हें खिलानी चाहिए, जिसने हमारी धुनों में मिठास घोली।

मंगलागौर. महाराष्ट्र में विवाह के बाद नई बहू के घर आने पर 'मंगलागौर' की पूजा होती, जिसमें आस-पड़ोस की स्त्रियाँ खुलकर गातीं-नाचतीं। लता जी कहती हैं कि यह परंपरा अब धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है।

कोरस की लड़कियाँ. कोरस यानी मुख्य गायक के पीछे गाने वाला समूह। उसकी लड़कियाँ (कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन, रेखा) लता जी के घर जैसी थीं। स्टूडियो में कुर्सियाँ कम होतीं, तो लता जी भी उनके साथ ज़मीन पर बैठकर बातें करतीं; बड़ी गायिका होकर भी कोई भेदभाव नहीं। अस्सी के बाद कोरस अलग रिकॉर्ड होने लगा।

संगीत की शक्ति. तानसेन के गाने से दीये जलने की कहानी पर लता जी कहती हैं कि पक्का नहीं कह सकतीं, पर संगीत में असीम शक्ति है। एक बार उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार बजाते-बजाते टूट गया; वे बोले: 'बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।' आख़िर में लता जी कहती हैं: गाना अमर है, शरीर नहीं। मराठी कहावत है 'गाव गेला वाहून, नाव गेलं राहून': गाँव बह जाता है, नाम रह जाता है।

संगीत में असीम शक्ति है; शरीर चला जाता है, पर नाम रह जाता है।

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