मधु कांकरिया — साना-साना हाथ जोड़ि
हिमालय के बदलते रूप
हिमालय के रूपों और लेखिका की अनुभूतियों का वर्णन करना।
ऊँचाई के साथ बदलता हिमालय. ऊपर चढ़ते-चढ़ते रास्ते सँकरे और जलेबी जैसे घुमावदार हो गए। हिमालय पहले छोटी पहाड़ियों जैसा, फिर विराट रूप में सामने आया: कहीं बादलों में छिपा, कहीं हरियाली ओढ़े।
तिस्ता और सेवन सिस्टर्स. सिलीगुड़ी से साथ चल रही तिस्ता नदी यहाँ चाँदी-सी चमकती, सबसे सुंदर लगी। 'सेवन सिस्टर्स वॉटर फ़ॉल' पर लेखिका ने बहती धारा में पाँव डुबोए। उसे लगा उसके भीतर की तामसिकता (बुराई, आलस, बुरी इच्छाएँ) इस साफ़ धारा में बह गई; वह खुद समय से परे बहती धारा जैसी हो गई। मन कविता जैसा हो उठा।
'थिंक ग्रीन'. रास्ते में एक बोर्ड पर लिखा था: 'थिंक ग्रीन', यानी पर्यावरण की सोचो।
माया और छाया का खेल. पल भर में सब कुछ बादलों से ढक जाता, फिर धुंध छँटती और नज़ारा बदल जाता। लेखिका ने इसे 'माया और छाया का खेल' कहा। भीतर-बाहर का फ़र्क मिट गया; उसे लगा वह ईश्वर के बहुत पास है।
लायुंग का बोध. लायुंग एक शांत छोटी बस्ती है, तिस्ता के किनारे। वहाँ लेखिका को लगा: सुख वहीं है जहाँ सब अपनी लय में चल रहे हैं। हमारी पीढ़ी ने प्रकृति की लय से खिलवाड़ करके बड़ा अपराध किया है। इस यात्रा में हिमालय उसके लिए सिर्फ़ नज़ारा नहीं, दर्शन (जीवन की सीख) बन गया।
आपकी बारी. लेखिका ने हिमालय के जितने रूप देखे, उन्हें क्रम से लिखिए: छोटी पहाड़ियाँ, घाटियाँ, झरने, बादल, बर्फ़। और सोचिए: किसी सुंदर जगह पर आपको कैसा लगा था?
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