अज्ञेय — मैं क्यों लिखता हूँ?
लेखक क्यों लिखता है
लिखने की भीतरी और बाहरी प्रेरणाओं में भेद करना।
लेखक और सवाल. अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) पूछते हैं: 'मैं क्यों लिखता हूँ?' सवाल आसान लगता है, पर इसका सच्चा जवाब लेखक के मन की गहरी परतों से जुड़ा है।
लिखकर ही पता चलता है. अज्ञेय का पहला जवाब: मैं इसलिए लिखता हूँ कि खुद जान सकूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ। बिना लिखे यह जवाब नहीं मिलता। लिखकर ही लेखक अपनी उस भीतरी विवशता (अंदर की मजबूरी, बेचैनी) को पहचानता है, और लिखकर ही उससे मुक्त (छुटकारा) होता है।
भीतरी और बाहरी कारण. नाम हो जाने के बाद कुछ बाहरी दबाव से भी लिखा जाता है:
- संपादक का आग्रह;
- प्रकाशक का तकाज़ा;
- पैसों की ज़रूरत।
सच्चा कृतिकार (रचनाकार) ईमानदारी से याद रखता है कि कौन-सी रचना भीतर से आई और कौन-सी दबाव से। सब लेखक कृतिकार नहीं होते।
अलार्म घड़ी की उपमा. कुछ लोग सुबह नींद खुलने पर भी तब तक बिस्तर में पड़े रहते हैं जब तक अलार्म न बजे। वैसे ही कुछ आलसी लेखक बाहरी दबाव के बिना लिख ही नहीं पाते; दबाव उनकी भीतरी विवशता को जगा देता है। अज्ञेय कहते हैं: मैं अपने आप उठ जाता हूँ, पर अलार्म बज जाए तो बुरा नहीं मानता। यानी बाहरी दबाव बस एक सहायक है, असली प्रेरणा भीतर की है।
सोचिए. क्या बाहरी दबाव सिर्फ़ लेखकों पर होता है? गायक, चित्रकार, खिलाड़ी, फ़िल्म बनाने वाले, इन पर भी दर्शकों, पैसे और समय का दबाव होता है। एक उदाहरण लिखिए।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.