भदंत आनंद कौसल्यायन — संस्कृति
संस्कृत मानव: खोज, ज्ञान और त्याग
संस्कृत व्यक्ति की पहचान और कल्याण से संस्कृति के संबंध को समझाना।
'संस्कृत' इंसान कौन? जिसकी बुद्धि ने कोई नया तथ्य खोजा, वही असली संस्कृत (संस्कृति वाला) इंसान है। उसकी संतान को वह चीज़ बिना मेहनत मिल जाती है; वह सभ्य भले बन जाए, संस्कृत नहीं कहलाएगी।
न्यूटन का उदाहरण. न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोजा, इसलिए वे संस्कृत मानव थे। आज का भौतिकी का विद्यार्थी न्यूटन से ज़्यादा बातें जानता है; उसे हम न्यूटन से ज़्यादा सभ्य कह सकते हैं, पर उतना संस्कृत नहीं।
संस्कृति के तीन स्रोत. लेखक पूछते हैं: संस्कृति के 'माता-पिता' कौन हैं?
- भौतिक प्रेरणा (ज़रूरत): आग, सुई-धागा;
- ज्ञानेप्सा (जानने की प्यास): पेट भरा है, तन ढका है, फिर भी खुले आसमान के नीचे लेटा कोई इंसान तारों का 'मोती भरा थाल' देखकर सो नहीं पाता, बस यह जानने को कि यह क्या है;
- दूसरों के लिए त्याग: नीचे देखिए।
सिर्फ़ पहले दो नहीं; तीसरा भी संस्कृति है।
त्याग भी संस्कृति. इन्हें क्या प्रेरित करता है?
- जो अपने मुँह का कौर छोड़कर दूसरे के मुँह में डाल दे;
- रोगी बच्चे को रातभर गोद में लिए बैठी माँ;
- लेनिन, जो अपनी डेस्क की सूखी डबल रोटी खुद न खाकर दूसरों को खिला देता;
- कार्ल मार्क्स, जिसने मज़दूरों को सुखी देखने के सपने में अपना जीवन दुख में बिताया;
- सिद्धार्थ (बुद्ध), जिन्होंने घर छोड़ा ताकि लड़ती-कटती मानवता सुख से रह सके।
सभ्यता = संस्कृति का फल. खाने-पहनने के तरीके, आने-जाने के साधन, यहाँ तक कि आपस में लड़ने-मरने के तरीके भी, सब हमारी सभ्यता हैं। पर जो योग्यता आत्म-विनाश के साधन (जैसे बम) बनवाए, वह संस्कृति है या असंस्कृति? संस्कृति का नाता कल्याण (सबकी भलाई) से टूटा, तो वह असंस्कृति बन जाती है, और उसका फल असभ्यता।
बाँटी नहीं जा सकती. जिसे लोग 'संस्कृति' कहकर बचाने के लिए दल बनाते हैं, वह अक्सर कूड़ा-करकट है, न संस्कृति, न बचाने लायक। मानव संस्कृति अविभाज्य है (बाँटी नहीं जा सकती), और उसमें जितना हिस्सा कल्याण का है, वही श्रेष्ठ और स्थायी (हमेशा रहने वाला) है।
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