नागार्जुन — यह दंतुरित मुसकान, फसल
'फसल'
फसल बनाने वाले तत्व और श्रम की महिमा समझाना।
फसल क्या है? खेत में लहलहाती फसल देखकर हम सोचते हैं: यह तो किसान ने उगाई। कवि पूछता है: फसल असल में है क्या? और फिर एक-एक करके जवाब देता है।
'एक के नहीं, दो के नहीं'. यह पंक्ति बार-बार आती है। फसल किसी एक-दो की देन नहीं:
- बहुत-सी नदियों का पानी, जो जादू करता है;
- लाखों-करोड़ों हाथों के स्पर्श की गरिमा (किसानों की मेहनत);
- हज़ारों खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म।
दोहराने से 'सबकी मेहनत' वाला भाव ज़ोर पकड़ता है।
फसल का फ़ॉर्मूला. बोर्ड पर एक-एक जोड़िए:
- पानी (नदियाँ);
- हाथ (मेहनत);
- मिट्टी (भूरी, काली, संदली);
- सूरज (फसल सूरज की किरणों का रूपांतर है: पौधे धूप की ऊर्जा को भोजन में बदलते हैं);
- हवा (फसल हवा की थिरकन का सिमटा हुआ रूप है)।
प्रकृति और इंसान साथ. किताब कहती है: प्रकृति और मनुष्य के सहयोग से ही कुछ बनता है। अकेली प्रकृति या अकेला किसान फसल नहीं उगा सकता।
भाषा. बोलचाल की भाषा, बिना भारी शब्दों के। उसकी गति और लय ही कविता को असरदार बनाती है।
आज के समय में. हम दुकान से सब खरीदते हैं और भूल जाते हैं कि खाना कहाँ से आता है। यह कविता हमें उपभोक्ता-संस्कृति (बस खरीदने-खाने वाली सोच) से खेती की संस्कृति के पास ले जाती है: मिट्टी, पानी और मेहनत का सम्मान।
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