मंगलेश डबराल — संगतकार
मंगलेश डबराल और 'संगतकार'
संगतकार की भूमिका और उसका प्रतीकात्मक अर्थ समझाना।
कवि. मंगलेश डबराल का गाँव था काफलपानी, ज़िला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड; वहीं सन् 1948 में वे पैदा हुए, पढ़ाई देहरादून में हुई। वे पत्रकार और संपादक रहे: 'पूर्वग्रह', 'अमृत प्रभात', और 1983 से 'जनसत्ता' में साहित्य संपादक; बाद में नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े। इनका निधन 2020 में हुआ।
रचनाएँ और शैली. चार कविता-संग्रह: 'पहाड़ पर लालटेन', 'घर का रास्ता', 'हम जो देखते हैं', 'आवाज़ भी एक जगह है'। साहित्य अकादेमी पुरस्कार और पहल सम्मान मिले; वे अच्छे अनुवादक भी थे। उनकी कविता में शोर नहीं; बारीक सुंदरता और साफ़, पारदर्शी भाषा है।
संगतकार कौन? संगतकार यानी गाने में मुख्य गायक का साथ देने वाला। सोचिए किसी बड़े गायक का मंच: बीच में वह गा रहा है, और उसके पीछे कोई धीमे से साथ गा रहा है, कोई तबला, कोई हारमोनियम बजा रहा है। लोग मुख्य गायक को ही देखते हैं; पीछे वालों पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
दो आवाज़ें. मुख्य गायक का स्वर 'चट्टान जैसा भारी' है। संगतकार की आवाज़ सुंदर, कमज़ोर, काँपती हुई है। संगतकार मुख्य गायक का छोटा भाई हो सकता है, या शिष्य, या कोई दूर का रिश्तेदार जो पैदल चलकर सीखने आता है। वह बहुत पुराने समय से गायक की गरज में अपनी गूँज मिलाता आया है।
भटके गायक को सहारा. कभी-कभी गायक अंतरे की उलझी तानों के 'जंगल' में खो जाता है, या अपने सुरों से आगे किसी अनहद (असीम, सीमा से परे) में भटक जाता है। तब संगतकार 'स्थायी' को सँभाले रहता है। स्थायी गीत की वह टेक (मुख्य पंक्ति) है जिस पर गाना बार-बार लौटता है। ध्यान दें: स्थायी, 'अस्थायी' नहीं; अस्थायी का अर्थ है कुछ देर का, जो उलटी बात है।
पीछे छूटा सामान. कवि कहता है: संगतकार मानो गायक का पीछे छूटा सामान समेट रहा हो, और उसे उसका बचपन याद दिला रहा हो, जब वह नौसिखिया (नया-नया सीखने वाला) था।
हर क्षेत्र में संगतकार. संगतकार हर उस इंसान का प्रतीक है जो किसी की सफलता के पीछे चुपचाप काम करता है: नाटक, फ़िल्म, संगीत, नृत्य, खेल, राजनीति, विज्ञान, हर जगह।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.