स्वयं प्रकाश — नेताजी का चश्मा
देशप्रेम के छोटे-छोटे रूप
दैनिक जीवन में देशप्रेम के रूप पहचानना और उन पर लिखना।
देश क्या है? किताब कहती है: चारों ओर सीमाओं से घिरी ज़मीन का नाम ही देश नहीं। देश बनता है उसके लोगों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों से। इन सबसे प्रेम करना और इनकी भलाई के लिए कोशिश करना ही देशभक्ति है।
कहानी में कौन देश बनाता है? सोचिए:
- नगरपालिका मूर्ति लगवाती है;
- मास्टर मोतीलाल जितना बना सके, बनाते हैं;
- कैप्टन रोज़ उसकी देखभाल करता है;
- बच्चे सरकंडे का चश्मा रख देते हैं;
- हालदार साहब यह सब देखते और महसूस करते हैं।
करोड़ों साधारण लोग, बड़े भी और बच्चे भी, अपने-अपने ढंग से देश बनाते हैं।
रोज़ के कामों में देशप्रेम. सिर्फ़ सीमा पर खड़े सैनिक ही देशप्रेम नहीं दिखाते। हम भी दिखाते हैं:
- सार्वजनिक चीज़ों (बस, पार्क, स्कूल की बेंच) को नुकसान न पहुँचाकर;
- पानी-बिजली बचाकर, पेड़ लगाकर;
- नियम मानकर, ईमानदारी से।
चौराहों पर मूर्तियाँ. मूर्तियाँ हमें बड़े लोगों के काम की याद और प्रेरणा देती हैं। उनकी साफ़-सफ़ाई और देखभाल हम सबकी ज़िम्मेदारी है। अपने इलाके के कलाकारों (मूर्तिकार, चित्रकार, संगीतकार) को भी बढ़ावा देना चाहिए, जैसे मास्टर मोतीलाल को मौका मिला।
शुक्ल जी की बात. किताब में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक अंश है: सच्चा देशप्रेम उन सबसे प्रेम है जिनके बीच हम रहते हैं: लोग, कोयल, आम के बौर, किसान की झोंपड़ी। सिर्फ़ औसत आमदनी के आँकड़े गिनाना प्रेम नहीं। 'प्रेम हिसाब-किताब नहीं है।'
सोचिए और लिखिए. आप अपने इलाके के चौराहे पर किसकी मूर्ति लगवाना चाहेंगे, और क्यों? उस मूर्ति के लिए आपकी क्या ज़िम्मेदारी होगी?
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.