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स्वयं प्रकाश — नेताजी का चश्मा

निपात और वाच्य

निपात पहचानना और वाक्यों को कर्मवाच्य व भाववाच्य में बदलना।

निपात क्या है? निपात वे छोटे शब्द हैं जो किसी शब्द या बात पर ज़ोर देते हैं: तो, ही, भी, तक, मात्र। जैसे:

  • 'नगरपालिका थी तो कुछ न कुछ करती भी रहती थी।'
  • 'हालदार साहब अब भी नहीं समझ पाए।'
  • 'दो साल तक वे गुज़रते रहे।'

इन्हें हटा दें, तो वाक्य चलता है, पर ज़ोर चला जाता है।

वाच्य: वाक्य में किसकी चलती है? वाच्य बताता है कि वाक्य में मुख्य कौन है:

  • कर्तृवाच्य: कर्ता (काम करने वाला) मुख्य। 'पानवाला पान खा रहा था।'
  • कर्मवाच्य: कर्म (जिस पर काम हुआ) मुख्य।
  • भाववाच्य: न कर्ता, न कर्म; बस क्रिया का भाव मुख्य।

कर्मवाच्य बनाना. कर्ता के साथ 'द्वारा' या 'से' लगाइए, और क्रिया को कर्म के लिंग-वचन के हिसाब से बदलिए:

  • 'पानवाला नया पान खा रहा था' → 'पानवाले द्वारा नया पान खाया जा रहा था।'
  • 'ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक मारे' → 'ड्राइवर द्वारा ज़ोर से ब्रेक मारे गए।' ('ब्रेक' बहुवचन, इसलिए 'मारे गए')

भाववाच्य बनाना. भाववाच्य में क्रिया हमेशा एकवचन, पुल्लिंग, अन्य पुरुष में रहती है। यह ज़्यादातर उन क्रियाओं से बनता है जिनका कर्म नहीं होता (बैठना, सोना, रोना), और अक्सर न कर पाने का भाव दिखाता है:

  • 'माँ बैठ नहीं सकती' → 'माँ से बैठा नहीं जाता।'
  • 'मैं देख नहीं सकती' → 'मुझसे देखा नहीं जाता।'
  • 'माँ रो भी नहीं सकती' → 'माँ से रोया भी नहीं जाता।'

सुझाव वाले वाक्य. 'चलो, अब सोते हैं' → 'चलो, अब सोया जाए।' 'अब चलते हैं' → 'अब चला जाए।'

निपात ज़ोर देते हैं; कर्मवाच्य में कर्म, भाववाच्य में क्रिया का भाव मुख्य होता है।

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