रामवृक्ष बेनीपुरी — बालगोबिन भगत
भगत का संगीत और बदलती ऋतुएँ
भगत के गायन और ऋतुओं के शब्द-चित्रों का वर्णन करना।
सिर्फ़ कबीर के गीत. भगत कबीर के सीधे-सादे पद गाते थे, किसी और के नहीं। (कुछ वीडियो उन्हें सीताराम या राधे-राधे गाता दिखाते हैं; यह किताब में नहीं है।) उनके कंठ से निकलकर ये पद जीवित हो उठते थे।
आषाढ़: धान की रोपनी. आषाढ़ की रिमझिम है। पूरा गाँव खेतों में है: कोई हल जोत रहा है, कोई रोपनी कर रहा है (धान के पौधे लगाना)। कीचड़ में लथपथ भगत एक-एक पौधा कतार में लगाते हुए गा रहे हैं। उनका गाना सुनकर:
- बच्चे खेलते-खेलते झूम उठते;
- मेड़ (खेत की सीमा) पर बैठी औरतें गुनगुनाने लगतीं;
- हलवाहों के पैर ताल पर उठने लगते;
- रोपनी करने वालों की उँगलियाँ लय में चलने लगतीं।
लेखक पूछता है: यह संगीत है या जादू!
भादो: आधी रात. भादो की अँधेरी अधरतिया (आधी रात) है, बारिश अभी थमी है। झींगुर और मेंढक शोर कर रहे हैं, पर भगत की खँजड़ी (छोटी ढफली) डिमक-डिमक बज रही है। वे कबीर का पद गाते हैं: 'गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुँक उठे ना!' (प्रिय तो गोद में ही है, फिर भी वह खुद को अकेली समझकर चौंक उठती है।) और: 'तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफ़िर जाग ज़रा!' सारी दुनिया सोई है; भगत का संगीत जाग रहा है, और जगा रहा है।
कार्तिक से फागुन: प्रभातियाँ. प्रभाती यानी भोर में गाया जाने वाला गीत। इन महीनों में भगत न जाने कब उठकर दो मील दूर नदी नहाने जाते, फिर गाँव के बाहर पोखर के ऊँचे भिंडे (टीले) पर कुश की चटाई पर बैठकर गाते। माघ की दाँत किटकिटाने वाली ठंड में लेखक काँप रहा था, पर गाते-गाते भगत के माथे पर पसीने की बूँदें चमकतीं।
गर्मी: 'संझा'. गर्मियों की उमस भरी शाम (संझा) को आँगन में आसन जमता। गाँव के प्रेमी लोग जुटते, खँजड़ियाँ और करताल बजतीं। भगत एक पद कहते, मंडली उसे दोहराती; धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होता, और अंत में बीच में खँजड़ी लिए भगत नाचने लगते, साथ में सबके तन-मन भी।
महीनों के नाम. आषाढ़, भादो, कार्तिक, माघ, फागुन विक्रम संवत के महीने हैं। यह कैलेंडर चैत्र से शुरू होता है और फागुन पर खत्म। प्रभातियाँ बच्चों को जगाने के लिए भी गाई जाती हैं; उनमें वीरता और उत्साह की बातें भी होती हैं।
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