मातृभूमि
लहर और छहर
कविता में नदियों के लिए आए शब्द 'लहर' और 'छहर' को समझो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 1 खोलो और कविता 'मातृभूमि' में नदियों वाला हिस्सा फिर से पढ़ो। वहाँ कवि दो सुंदर शब्दों का प्रयोग करता है: 'लहर' और 'छहर'। पृष्ठ 5 पर किताब इन दोनों के अर्थ बताती है।
'लहर' का अर्थ है पानी का हिलोरा — जैसे पानी ऊपर-नीचे उठता-गिरता है। इसके और अर्थ भी हैं: मौज, उमंग, वेग (तेज़ी) और जोश। कविता में गंगा, यमुना और त्रिवेणी नदियाँ लहर रही हैं — यानी उनका पानी लहरों में उठता-गिरता, उमंग से बह रहा है।
'छहर' का अर्थ है बिखरना, छितराना, छिटकना या फैलना। कविता में नदियों की जगमगाती, निराली छटा (सुंदरता) पग-पग पर छहर रही है — यानी उनकी सुंदरता हर कदम पर बिखरी हुई है, चारों ओर फैली हुई है।
तो किताब के दोनों प्रश्नों के उत्तर ये हुए: पानी नदियों का — गंगा, यमुना और त्रिवेणी का — लहर रहा है; और उनकी छटा पग-पग पर, यानी हर कदम पर, छहर रही है। दोनों शब्दों की ध्वनि भी मिलती है — लहर, छहर — इससे कविता गाने में मीठी लगती है।
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