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मातृभूमि

फूँक से बजने वाले वाद्य

फूँक से बजने वाले वाद्यों के बारे में जानो।

कविता 'मातृभूमि' में आता है कि श्रीकृष्ण ने वंशी की तान सुनाई। अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 8 खोलो और 'वंशी-से' पढ़ो। किताब बताती है कि 'वंशी' बाँसुरी को कहते हैं। यह एक 'वाद्य' है, यानी बाजा — और यह मुँह से फूँक कर बजाया जाता है।

फूँक कर बजने वाले वाद्यों में, बजाने वाला अपनी साँस से हवा अंदर फूँकता है और उससे सुर निकलता है। पृष्ठ 8 के शब्द-जाल में और पृष्ठ 9 के चित्रों में ऐसे आठ वाद्य हैं: बाँसुरी, शहनाई, अलगोजा, शंख, बीन, नादस्वरम, भंकोरा और सींगी।

इनमें से कुछ को पहचानो: बाँसुरी बाँस की पतली नली होती है, जिसमें छेद होते हैं। शहनाई शादी-ब्याह और शुभ अवसरों पर बजती है। अलगोजा में दो बाँसुरियाँ एक साथ बजाई जाती हैं। शंख समुद्र के एक जीव का खोल होता है, जिसे पूजा में फूँक कर बजाते हैं। बीन को सँपेरे बजाते हैं। नादस्वरम दक्षिण भारत का शहनाई जैसा वाद्य है।

हर बाजा फूँक से नहीं बजता। ढोलक और तबला हाथ से चोट करके बजाए जाते हैं, और सितार के तार छेड़कर बजाए जाते हैं। इसलिए ये फूँक कर बजने वाले वाद्य नहीं हैं।

'वंशी' बाँसुरी को कहते हैं, जो मुँह से फूँक कर बजाया जाने वाला वाद्य है; बाँसुरी, शहनाई, अलगोजा, शंख, बीन, नादस्वरम, भंकोरा और सींगी — ये सब फूँक कर बजने वाले वाद्य हैं।

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