परीक्षा
कहानी का अंत
कहानी का अंत पढ़ो और जानो कि असली परीक्षा क्या थी।
यह बात आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 10 'परीक्षा' (प्रेमचंद) के आखिरी भाग की है। आखिर महीना पूरा हुआ और चुनाव का दिन आ गया। उम्मीदवार सुबह से ही अपनी किस्मत का फ़ैसला सुनने को बेचैन थे। हर चेहरे पर कभी आशा आती, कभी निराशा।
शाम को राजा साहब का दरबार सजा। शहर के रईस, राज्य के कर्मचारी और सारे उम्मीदवार आ बैठे। उम्मीदवारों के दिल धड़क रहे थे। तब सरदार सुजानसिंह खड़े हुए। उन्होंने कहा कि इस पद के लिए ऐसे आदमी की ज़रूरत थी जिसके हृदय में दया हो और साथ में आत्मबल भी — हृदय ऐसा जो उदार हो, और आत्मबल ऐसा जो मुसीबत का वीरता से सामना करे।
फिर उन्होंने घोषणा की कि रियासत के सौभाग्य से ऐसा आदमी मिल गया है, और उन्होंने पंडित जानकीनाथ को दीवानी मिलने की बधाई दी। जानकीनाथ वही युवक था जिसने किसान की गाड़ी निकाली थी!
सबकी आँखें जानकीनाथ की ओर उठीं। रियासत के कर्मचारियों और रईसों की आँखों में उसके लिए सत्कार (आदर) था, पर उम्मीदवारों की आँखों में ईर्ष्या (जलन)।
सुजानसिंह ने कारण भी बताया: जिस आदमी ने खुद घायल होकर भी एक गरीब किसान की भरी गाड़ी दलदल से निकालकर नाले के ऊपर चढ़ा दी, उसके हृदय में साहस, आत्मबल और उदारता है। ऐसा आदमी गरीबों को कभी नहीं सताएगा। वह चाहे कभी धोखा खा जाए, पर दया और धर्म से कभी नहीं हटेगा। यही थी असली 'परीक्षा' — जो किसी को पता ही नहीं था कि हो रही है।
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