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हिंद महासागर में छोटा-सा हिंदुस्तान

छोटा-सा हिंदुस्तान

जानो कि मॉरिशस को छोटा-सा हिंदुस्तान क्यों कहा जाता है।

लेखक मॉरिशस पहुँचे तो रात थी, अँधेरा था, पानी बरस रहा था — फिर भी हवाई अड्डे पर उनके स्वागत में बहुत लोग खड़े थे। यह देखकर उन्हें लगा कि वे जहाँ आए हैं, वह छोटे पैमाने पर भारत ही है। पाठ में वे बताते हैं कि ऐसा क्यों लगता है।

मॉरिशस में ज़्यादातर लोग भारतीय खानदान (भारतीय मूल) के हैं। राजधानी पोर्टलुई की गलियों के नाम कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद और बम्बई हैं, और एक पूरे मोहल्ले का नाम काशी है। वहाँ बनारस भी है, गोकुल भी और ब्रह्मस्थान भी। वहाँ माध्यमिक स्कूलों को कॉलेज कहने का रिवाज़ है।

मॉरिशस में ऊख (गन्ने) की खेती और उसके व्यवसाय को जो सफलता मिली, वह भारतीयों के कारण मिली। लेखक का तर्क है: अगर भारतीय वंश के लोग इस टापू पर न गए होते, तो ऊख की खेती असंभव हो जाती और चीनी के कारखाने बढ़ते ही नहीं। इसलिए वे कहते हैं कि मॉरिशस की असली ताकत भारतीय लोग ही हैं।

वहाँ के मालिक चाहते थे कि भारतीय भी क्रिस्तान (ईसाई) हो जाएँ। भारतीयों ने अत्याचार सहे, पर लालच (प्रलोभनों) को ठुकरा दिया। वे अपने धर्म पर डटे रहे, और जिस द्वीप पर वे पहुँचे थे, उसे उन्होंने छोटा-सा हिंदुस्तान बना डाला। लेखक कहते हैं कि यह ऐसी सफलता है जिस पर सभी भारतीयों को गर्व होना चाहिए।

लेखक यह भी कहते हैं कि भारत में बैठे-बैठे हम नहीं समझ पाते कि हमारी संस्कृति कितनी जीवंत (प्राणवती) और चिरायु (बहुत समय तक जीने वाली) है; मॉरिशस जाकर यह आसानी से समझ में आ जाता है। सार यह है कि मॉरिशस में भारत की बहुत-सी विशेषताएँ दिखाई देती हैं।

मॉरिशस छोटे पैमाने पर भारत लगता है, क्योंकि वहाँ भारत की बहुत-सी विशेषताएँ दिखती हैं — भारतीय मूल के ज़्यादातर लोग, भारतीय नामों वाली गलियाँ और मोहल्ले, और अपने धर्म-संस्कृति पर डटे रहे लोग।

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