मेरी माँ
रामप्रसाद 'बिस्मिल'
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा से लिया पाठ 'मेरी माँ' शुरू करो।
आपकी किताब 'मल्हार' का पाठ 6 'मेरी माँ' रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का एक अंश (हिस्सा) है। आत्मकथा यानी किसी व्यक्ति की अपने ही जीवन की कहानी, जो वह खुद लिखता है — इसलिए उसमें 'मैं' बोलने वाला लेखक ही कहानी का मुख्य पात्र होता है। पाठ से पहले, पृष्ठ 51 पर, और पाठ के बाद पृष्ठ 55 पर 'लेखक से परिचय' में उनके बारे में बताया गया है।
रामप्रसाद 'बिस्मिल' का जन्म सन 1897 में हुआ था। उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का राज था। बिस्मिल छोटी-सी आयु से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेज़ों से लड़ते रहे। वे स्वतंत्रता संग्राम के एक क्रांतिकारी थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया, और सन 1927 में, मात्र तीस वर्ष की आयु में, उन्हें फाँसी दे दी।
जेल में रहते हुए बिस्मिल ने चोरी-छिपे अपनी आत्मकथा लिखी और उसे अंग्रेज़ों से बचाते-बचाते जेल से बाहर भेजते रहे। उनके साथियों ने इसे प्रकाशित करवाया और इसका नाम रखा — 'निज जीवन की एक छटा' ('निज' यानी अपना)। इस पुस्तक से लोगों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध क्रोध और बढ़ गया। पाठ 'मेरी माँ' इसी आत्मकथा का एक अंश है।
सोचो: जेल की कोठरी में, फाँसी से पहले, बिस्मिल ने अपने जीवन के बारे में लिखते हुए सबसे ज़्यादा अपनी माँ को याद किया। इस पाठ में यही दिखता है कि उनके जीवन में माँ की कितनी बड़ी जगह थी।
बिस्मिल एक अच्छे कवि और लेखक भी थे; उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह ने उनके बारे में कहा था कि बिस्मिल बड़े होनहार नौजवान थे और गज़ब के शायर (कवि) थे।
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