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मेरी माँ

माँ ने साथ दिया

पढ़ो कि कठिन समय में माँ ने बिस्मिल का साथ कैसे दिया।

यह पाठ आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 6 'मेरी माँ' से है। इसमें रामप्रसाद 'बिस्मिल' अपनी माँ के बारे में बताते हैं — कि उनकी माँ ने हर कदम पर उनका साथ कैसे दिया।

बिस्मिल की बड़ी इच्छा थी कि वे लखनऊ कांग्रेस में जाएँ। उनकी दादीजी और पिताजी इसका विरोध करते रहे, पर माताजी ने उन्हें जाने का खर्च दे ही दिया।

उन्हीं दिनों शाहजहाँपुर में सेवा-समिति शुरू हुई थी, और बिस्मिल बड़े उत्साह से उसमें सहयोग देते थे। पिताजी और दादीजी को उनके ये काम अच्छे नहीं लगते थे। पर माताजी उनका उत्साह कभी टूटने नहीं देती थीं — और इसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार भी सहनी पड़ती थी। बिस्मिल लिखते हैं कि उनकी माताजी सचमुच देवी हैं; उनमें जो कुछ जीवन और साहस आया, वह माताजी और गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपा का ही परिणाम था।

दादीजी और पिताजी बिस्मिल के विवाह के लिए बहुत ज़ोर देते थे, पर माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पूरी होने के बाद ही विवाह करना ठीक होगा।

माताजी के प्रोत्साहन (हिम्मत बढ़ाने) और अच्छे व्यवहार से बिस्मिल के जीवन में ऐसी दृढ़ता (पक्कापन) आई कि किसी भी आपत्ति या संकट के आने पर भी उन्होंने अपना संकल्प (पक्का निश्चय) नहीं छोड़ा।

बिस्मिल की माँ ने दादीजी और पिताजी के विरोध के बावजूद उनका साथ दिया — लखनऊ कांग्रेस का खर्च दिया, सेवा-समिति के काम में उत्साह बनाए रखा, शिक्षा के बाद ही विवाह की बात कही — और उनके प्रोत्साहन से बिस्मिल ने संकट में भी अपना संकल्प नहीं छोड़ा।

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