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मेरी माँ

सत्य की घटना

बिस्मिल के जीवन में सत्य से जुड़ी एक घटना पढ़ो।

यह पाठ आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 6 'मेरी माँ' से है। इसमें बिस्मिल अपने जीवन की एक घटना बताते हैं, जिससे पता चलता है कि वे सच के कितने पक्के थे।

एक बार बिस्मिल के पिताजी ने किसी पर दीवानी मुकदमा किया था (दीवानी मुकदमा यानी पैसे या ज़मीन-जायदाद के झगड़े का अदालत में चलने वाला मामला)। पिताजी वकील से कह गए थे कि जो भी काम हो, वह बिस्मिल से करा लें।

एक दिन ज़रूरत पड़ने पर वकील साहब ने बिस्मिल को बुलाया और कहा कि वे वकालतनामे पर अपने पिताजी के हस्ताक्षर कर दें। (वकालतनामा वह कागज़ है जिस पर हस्ताक्षर करके कोई व्यक्ति वकील को अदालत में अपनी ओर से बोलने का अधिकार देता है।) यानी वकील चाहते थे कि बिस्मिल पिताजी की जगह, पिताजी के नाम से, खुद हस्ताक्षर कर दें।

बिस्मिल ने तुरंत मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह तो धर्म के विरुद्ध होगा — ऐसा पाप वे कभी नहीं करेंगे। वकील साहब ने बहुत समझाया कि ऐसा न करने से मुकदमा खारिज हो जाएगा (रद्द हो जाएगा)। पर बिस्मिल पर कोई असर नहीं हुआ, और उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए।

बिस्मिल लिखते हैं कि वे अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करते थे — चाहे कुछ भी हो जाए, सच्ची बात कह देते थे।

पिताजी के मुकदमे में वकील ने बिस्मिल से वकालतनामे पर पिताजी के हस्ताक्षर करने को कहा, पर मुकदमा खारिज होने के डर के बावजूद उन्होंने इसे धर्म-विरुद्ध पाप कहकर मना कर दिया, क्योंकि वे हमेशा सत्य पर चलते थे।

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