मेरी माँ
माँ ने स्वयं पढ़ना सीखा
जानो कि बिस्मिल की माँ ने स्वयं पढ़ना कैसे सीखा।
यह पाठ आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 6 'मेरी माँ' से है। इसमें बिस्मिल बताते हैं कि उनकी माँ ने कम आयु में नए घर में आकर खुद को कैसे ढाला और अपने बल पर पढ़ना-लिखना कैसे सीखा।
बिस्मिल की माताजी ग्यारह वर्ष की आयु में विवाह करके शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय वे बिल्कुल अशिक्षित थीं — गाँव की एक छोटी लड़की जैसी, जिन्हें पढ़ना-लिखना नहीं आता था।
शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिन बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को घर के काम सिखाए। थोड़े ही दिनों में माताजी ने घर का सारा काम-काज समझ लिया और भोजन आदि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं।
बिस्मिल के जन्म के पाँच या सात वर्ष बाद माताजी ने हिंदी पढ़ना शुरू किया। पढ़ने का शौक उनके मन में खुद ही पैदा हुआ था। मुहल्ले की जो सखी-सहेलियाँ घर आती थीं, उनमें जो पढ़ी-लिखी थीं, उनसे माताजी अक्षर-बोध करतीं, यानी अक्षर पहचानना सीखतीं। घर का सब काम करने के बाद जो भी समय मिलता, उसमें वे पढ़ना-लिखना करतीं।
मेहनत का फल मिला: थोड़े ही दिनों में माताजी देवनागरी लिपि में लिखी पुस्तकें पढ़ने लगीं। और फिर बिस्मिल की बहनों को छोटी आयु में माताजी ही पढ़ाया करती थीं।
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