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जलाते चलो

कविता: जलाते चलो

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविता 'जलाते चलो' पढ़ो।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 60 खोलो और पाठ 7 की कविता 'जलाते चलो' पढ़ो। कविता पृष्ठ 61 तक चलती है। इसे हिंदी के प्रसिद्ध कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने लिखा है। यह आशा और उत्साह जगाने वाली कविता है।

पहले दो शब्द समझ लो: अमावस वह रात है जब चाँद बिल्कुल नहीं दिखता, और पूर्णिमा वह रात है जब पूरा गोल चाँद चमकता है। इस कविता में अँधेरा (तिमिर) बुराई, दुख और निराशा का निशान है, और दिया अच्छाई, प्रेम और आशा का।

कविता की शुरुआत में कवि कहता है कि स्नेह (प्रेम) से भरे दिये जलाते चलो — कभी न कभी धरती का अँधेरा ज़रूर मिटेगा। फिर कवि कहता है कि विज्ञान में इतनी शक्ति है कि वह अमावस की अँधेरी रात को भी पूर्णिमा जैसी उजली बना सकता है; फिर भी आज दुनिया पर दिन में ही अमावस की रात जैसा अँधेरा छा रहा है। बाहर रोशनी बहुत है, पर लोगों के मन में प्रेम कम है। इसलिए जो बिजली के दिये बिना स्नेह के जल रहे हैं, उन्हें बुझा दो, नहीं तो रास्ता नहीं मिलेगा।

इसके बाद कवि किसी को 'तुम' कहकर बात करता है। यह 'तुम' हम मनुष्य हैं — तुम भी, मैं भी। कविता कहती है कि तुम्हीं ने सबसे पहले दीप जलाकर तिमिर (अँधेरे) की चुनौती स्वीकार की थी, और अँधेरे की सरिता (नदी) पार करने के लिए दीपों की नाव बनाई थी। वह नाव लगातार चलाते रहो — एक दिन अँधेरे का किनारा मिलेगा।

युगों से तुमने अनगिनत दिये जलाए और पवन (हवा) ने अनगिनत दिये बुझा भी दिए — दीवाली की रात छत पर रखे दिये जैसे हवा से बुझ जाते हैं। समय साक्षी है, यानी समय इसका गवाह है। पर बुझकर भी वे जो रोशनी दे गए, उसी से अँधेरे को उजाला मिलेगा। जिन्होंने भलाई के लिए अपना जीवन दे दिया, उनका उजाला आज भी हमें रास्ता दिखाता है।

आखिर में कवि कहता है कि दिये और तूफ़ान की यह कहानी हमेशा से चली आ रही है और चलती रहेगी। जो लौ पहली बार जली थी, वह आज भी सोने जैसी जल रही है। अगर धरती पर एक भी दिया बचा रहेगा, तो एक दिन निशा (रात) को सवेरा ज़रूर मिलेगा।

तो कविता हमसे क्या कहती है? भलाई के काम करते रहो और निराश मत हो। दिया जलाना यानी प्रेम से अच्छा काम करना। अँधेरा चाहे कितना भी हो, अच्छे काम करते रहने से एक दिन उजाला ज़रूर आएगा।

हवा दिये बुझाती रहेगी — पर जब तक एक भी दिया जलता है, सवेरा आएगा।

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