जलाते चलो
दिये और अँधेरा
कविता में दियों और अँधेरे का अर्थ समझो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 60 खोलो और कविता 'जलाते चलो' फिर से पढ़ो। इस पाठ में हम देखेंगे कि कविता में किसे जलाने और किसे बुझाने की बात है, और अँधेरे (तिमिर) के लिए कौन-कौन से उदाहरण आए हैं।
जलाना किसे है? कवि कहता है कि स्नेह (प्रेम) से भरे दिये जलाते चलो। बुझाना किसे है? जो बिजली के दिये (विद्युत-दिये) बिना स्नेह के जल रहे हैं, उन्हें बुझा दो — नहीं तो रास्ता (पथ) नहीं मिलेगा।
कवि यह भी कहता है कि विज्ञान में इतनी शक्ति छिपी है कि वह अमावस की अँधेरी रात को पूर्णिमा जैसी उजली बना दे। फिर भी कवि पूछता है कि आज दुनिया पर दिन में ही अमावस की रात जैसा अँधेरा क्यों छा रहा है।
कविता में अँधेरे के तीन उदाहरण आए हैं: अमावस की निशा (अमावस की अँधेरी रात), तिमिर की सरिता (अँधेरे की नदी) और तिमिर की शिला (अँधेरे की चट्टान)। कविता कहती है कि मनुष्य ने दीपों की नाव बनाकर अँधेरे की नदी पार करने की ठानी, और युगों से अँधेरे की शिला पर अनगिनत दिये जलाए।
पवन (हवा) ने अनगिनत जलते दिये बुझा दिए — समय इसका साक्षी (गवाह) है। पर कविता कहती है कि बुझकर भी वे दिये जो ज्योति (रोशनी) दे गए, उसी से अँधेरे को उजाला मिलेगा।
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