जलाते चलो
पंक्ति और भाव
कविता की पंक्तियों को उनके सही भाव से मिलाओ।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 65 खोलो। वहाँ 'मिलान' में कविता 'जलाते चलो' की चार पंक्तियाँ हैं और उनके सामने मिलते-जुलते चार भाव। कविता पृष्ठ 60 पर है। यहाँ हम हर पंक्ति का भाव सरल शब्दों में समझेंगे।
'तिमिर का किनारा' वाली पंक्ति: कवि कहता है कि दीपों की नाव चलाते रहो, कभी न कभी अँधेरे का किनारा ज़रूर मिलेगा। यहाँ अँधेरा दुनिया की समस्याएँ हैं, और किनारा उनका अंत। भाव है — विश्व की समस्याओं से एक न एक दिन छुटकारा अवश्य मिलेगा।
'दिये स्नेह भर-भर' वाली पंक्ति: कवि कहता है कि प्रेम से भरे दिये जलाते चलो। स्नेह का दिया जलाना यानी दूसरों के लिए अच्छा करना। भाव है — दूसरों के सुख-चैन के लिए प्रयास करते रहिए।
'दिवस ही में अमावस' वाली पंक्ति: कवि पूछता है कि आज दुनिया पर दिन में ही अमावस की रात जैसा अँधेरा क्यों छा रहा है। दिन में अँधेरा यानी सब कुछ होते हुए भी दुख। भाव है — विश्व में सुख-शांति क्यों कम होती जा रही है?
'बिना स्नेह विद्युत-दिये' वाली पंक्ति: कवि कहता है कि जो बिजली के दिये बिना स्नेह के जल रहे हैं, उन्हें बुझा दो, नहीं तो रास्ता नहीं मिलेगा। भाव है — विश्व की भलाई का ध्यान रखे बिना प्रगति करने से कोई लाभ नहीं होगा।
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