मैया मैं नहिं माखन खायो
पद: मैया मैं नहिं माखन खायो
सूरदास का पद 'मैया मैं नहिं माखन खायो' पढ़ो और नटखट कृष्ण से मिलो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 94 खोलो और पाठ 9 का पद 'मैया मैं नहिं माखन खायो' पढ़ो। इसे महाकवि सूरदास ने ब्रजभाषा में लिखा है। ब्रजभाषा मथुरा, वृंदावन और गोवर्धन वाले ब्रज क्षेत्र की बोली है — वही जगहें जहाँ कृष्ण का बचपन बीता। सूरदास ने अपना ज़्यादातर जीवन वहीं कृष्ण के भजन गाते हुए बिताया।
पद में बालक श्रीकृष्ण अपनी माँ यशोदा से बात कर रहे हैं। माँ को लगता है कि कृष्ण ने माखन चुराकर खाया है, और कृष्ण हर तरह से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उन्होंने माखन नहीं खाया। पूरा पद कृष्ण के एक के बाद एक तर्कों (सफ़ाई में दी गई बातों) से बना है।
पहला तर्क — मैं तो घर पर था ही नहीं। कृष्ण कहते हैं: माँ, सुबह होते ही तुमने मुझे गायों के पीछे मधुबन भेज दिया था। मैं चार पहर तक बंसीवट में इधर-उधर भटकता रहा और साँझ होने पर घर लौटा। पुराने समय में घड़ी नहीं थी, तो समय पहर में गिना जाता था: एक पहर तीन घंटे का, और दिन-रात में आठ पहर। यानी चार पहर = पूरा दिन!
दूसरा तर्क — मैं पहुँच ही नहीं सकता। मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं — मैं ऊँचे लटके छीके तक कैसे पहुँच सकता हूँ? तीसरा तर्क — मुँह पर लगा माखन दूसरों की शरारत है। यह इन ग्वाल-बालों ने लगाया है। ये सब मुझसे बैर रखते हैं, इन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन लिपटा दिया।
अब कृष्ण माँ से रूठने लगते हैं। वे कहते हैं: माँ, तुम मन की बहुत भोली हो, जो इनकी बातों में आ गई। लगता है तुम्हारे मन में कोई भेद आ गया है, जो तुमने मुझे पराया समझ लिया। लो, अपनी लाठी और कंबल वापस ले लो — तुमने मुझे बहुत नाच नचाया है!
आखिरी पंक्ति में कवि सूरदास अपना नाम लेकर बताते हैं कि कृष्ण की ये भोली बातें सुनकर यशोदा मुसकरा उठीं और उन्होंने कृष्ण को उठाकर गले से लगा लिया। माँ सब समझ गई थीं — पर बेटे की प्यारी बातों के आगे गुस्सा टिक नहीं पाया।
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