मैया मैं नहिं माखन खायो
पंक्ति और भावार्थ
पद की हर पंक्ति का भावार्थ समझो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 94 खोलो और सूरदास का पद 'मैया मैं नहिं माखन खायो' फिर से पढ़ो। पद ब्रजभाषा में है, इसलिए हर पंक्ति का भावार्थ — यानी उसका मतलब आज की हिंदी में — समझना ज़रूरी है। पृष्ठ 100 पर किताब ने छह पंक्तियाँ और उनके भावार्थ मिलाने को दिए हैं। यहाँ हम पंक्तियों को उनके पहले एक-दो शब्दों से पहचानेंगे।
'भोर भयो' से शुरू होने वाली पंक्ति में कृष्ण कहते हैं: सुबह होते ही तुमने मुझे गायों के पीछे मधुबन भेज दिया। 'चार पहर' वाली पंक्ति में: मैं चार पहर बंसीवट में भटकने के बाद साँझ होने पर घर आया।
'मैं बालक' से शुरू होने वाली पंक्ति में: मैं छोटा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं, मैं छीके तक कैसे पहुँच सकता हूँ? 'ग्वाल-बाल' से शुरू होने वाली पंक्ति में: ये सब सखा मुझसे बैर रखते हैं, इन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन लिपटा दिया।
'तू माता' से शुरू होने वाली पंक्ति में: माँ, तुम मन की बड़ी भोली हो, इनकी बातों में आ गई हो। और 'जिय तेरे' से शुरू होने वाली पंक्ति में: तुम्हारे मन में ज़रूर कोई भेद है, जो तुमने मुझे पराया समझ लिया।
भावार्थ खोजने का एक आसान तरीका है: पंक्ति के कठिन शब्दों का अर्थ सोचो। जैसे 'जिय' का अर्थ है मन, और 'परायो' का अर्थ है पराया। इन्हें जोड़ते ही पूरी पंक्ति का मतलब खुल जाता है।
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