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मीरा के पद

पदों की रचना

समझिए कि मीरा के पद कैसे रचे गए हैं।

पृष्ठ 131 पर 'कविता की रचना'। दो पंक्तियाँ: "मीरा के प्रभु संतन सुखदाई" और "मीरा के प्रभु गिरधरनागर"। दोनों पदों के अंत में मीरा ने अपना नाम लिख दिया है!

"मीरा के समय के अनेक कवि अपनी रचना के अंत में अपने नाम को सम्मिलित कर दिया करते थे। आज भी कुछ कवि अपना नाम कविता में जोड़ देते हैं।"

ऐसा क्यों? उस समय रचनाएँ छपती नहीं थीं; वे गाकर, मुँह से मुँह तक आगे जाती थीं। नाम रचना के भीतर हो, तो वह रचना के साथ-साथ चलता रहता था। पाठ 6 में भी आपने यही देखा था: "कह गिरिधर कविराय"।

पदों की और विशेषताएँ भी देखिए:

  • छोटी-छोटी पंक्तियाँ
  • श्रीकृष्ण के लिए अलग-अलग नाम

अब पृष्ठ 133 पर 'कविता का सौंदर्य'। पंक्ति: "बरसे बदरिया सावन की।" 'बरसे' और 'बदरिया' दोनों 'ब' से शुरू होते हैं। यानी 'ब' वर्ण की आवृत्ति (दोहराव) हो रही है, और इसी से पंक्ति और सुंदर लगती है।

पदों में ऐसे और उदाहरण ढूँढ़िए:

  • 'सावन की मन भावन की' ('-आवन' की ध्वनि दो बार)
  • 'उमड़ घुमड़'
  • 'मोहनि मूरति'

ज़ोर से बोलकर देखिए; ध्वनि का मज़ा सुनाई देगा!

मीरा ने दोनों पदों के अंत में अपना नाम लिख दिया — और 'बरसे बदरिया' में 'ब' की आवृत्ति है।

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